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श्रीमद्भगवद्गीता

"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन मा कर्मफलहेतुर्भूमा ते संगोऽस्त्वकर्मणि"

चौथा अध्याय : ज्ञान-कर्म-सन्यास-योग || Gyan Karma Sanyasa Yoga (Gyan Yoga)

श्लोक : 0१

अनुवाद: श्रीभगवान ने कहा: मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य (विवस्वान) को कहा था। सूर्य ने इसे मनु को कहा और मनु ने इसे इक्ष्वाकु को बताया।

श्लोक : 0

अनुवाद: हे परंतप (अर्जुन)! इस प्रकार परंपरा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना, किंतु बहुत समय बीत जाने के कारण वह योग इस संसार में लुप्त हो गया है।

श्लोक : 0

अनुवाद: तू मेरा भक्त और सखा है, इसलिए वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझे कहा है; क्योंकि यह अत्यंत गोपनीय रहस्य है।

श्लोक : 0

अनुवाद: अर्जुन ने कहा: आपका जन्म तो अभी हाल ही का है और सूर्य का जन्म बहुत पुराना है। मैं इस बात को कैसे समझूँ कि आप ही ने कल्प के आरंभ में इस योग का उपदेश दिया था?

श्लोक : 0

अनुवाद: श्रीभगवान ने कहा: हे परंतप (अर्जुन)! मेरे और तेरे अनेक जन्म हो चुके हैं। उन सबको मैं जानता हूँ, किंतु तू नहीं जानता।

श्लोक : 0

अनुवाद: मैं अजन्मा और अविनाशी स्वरूप होते हुए भी तथा समस्त प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ।

श्लोक : 0

अनुवाद: हे भारत (अर्जुन)! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने आपको प्रकट करता हूँ।

श्लोक : 0

अनुवाद: साधु पुरुषों का उद्धार करने, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने और धर्म की स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।

श्लोक : 0

अनुवाद: हे अर्जुन! मेरे इस अलौकिक जन्म और कर्म को जो तत्त्व से जान लेता है, वह शरीर को त्यागकर फिर जन्म को प्राप्त नहीं होता, बल्कि मुझे ही प्राप्त होता है।

श्लोक : १०

अनुवाद: आसक्ति, भय और क्रोध से रहित, मुझ में लीन रहने वाले, और मेरा ही आश्रय लेने वाले बहुत से मनुष्य ज्ञान रूपी तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं।

श्लोक : ११

अनुवाद: जो मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ, क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।

श्लोक : १२

अनुवाद: इस मनुष्य लोक में कर्मों के फल की सिद्धि चाहने वाले लोग देवताओं का पूजन करते हैं। क्योंकि कर्मों से उत्पन्न होने वाली सिद्धि शीघ्र ही मिल जाती है।

श्लोक : १३

अनुवाद: गुणों और कर्मों के विभाग के अनुसार मैंने ही चारों वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) की रचना की है। इस सृष्टि का कर्ता होने पर भी तू मुझे अकर्ता और अविनाशी ही जान।

श्लोक : १४

अनुवाद: मुझे कर्मों का फल नहीं बाँधता, क्योंकि मुझे कर्मों के फल की कोई इच्छा नहीं है। जो मुझे इस प्रकार तत्त्व से जान लेता है, वह भी कर्मों के बंधन में नहीं बँधता।

श्लोक : १५

अनुवाद: पूर्वकाल में मोक्ष की इच्छा रखने वालों ने भी इसी प्रकार जानकर कर्म किए हैं। इसलिए तू भी वही कर्म कर, जो पहले के ज्ञानी पुरुषों ने किया है।

श्लोक : १६

अनुवाद: कर्म क्या है और अकर्म क्या है, इस बात के निर्णय में बुद्धिमान लोग भी मोहित हो जाते हैं। इसलिए मैं तुझे वह कर्मतत्त्व भलीभाँति समझाकर कहूँगा, जिसे जानकर तू अशुभ (संसारबंधन) से मुक्त हो जाएगा।

श्लोक : १७

अनुवाद: कर्म के स्वरूप को भी जानना चाहिए, अकर्म के स्वरूप को भी जानना चाहिए और विकर्म के स्वरूप को भी जानना चाहिए। क्योंकि कर्म की गति गहन है।

श्लोक : १८

अनुवाद: जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता है और अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है, वह योगी है और संपूर्ण कर्मों को करने वाला है।

श्लोक : १९

अनुवाद: जिसके संपूर्ण कर्म बिना कामना और संकल्प के होते हैं, और जिसके सभी कर्म ज्ञान रूपी अग्नि से भस्म हो गए हैं, उस व्यक्ति को ज्ञानीजन पंडित कहते हैं।

श्लोक : 0१

अनुवाद: जो मनुष्य कर्मों के फल की आसक्ति को त्यागकर, हमेशा संतुष्ट रहता है और किसी का सहारा नहीं लेता, वह कर्मों में अच्छी तरह प्रवृत्त होने पर भी वास्तव में कुछ नहीं करता।

श्लोक : 0१

अनुवाद: जिसने आशाओं को त्याग दिया है, जिसका मन और आत्मा पूरी तरह से वश में है और जिसने सभी संग्रहों को त्याग दिया है, ऐसा व्यक्ति केवल शरीर से कर्म करते हुए भी पाप को प्राप्त नहीं होता।

श्लोक : २२

अनुवाद: जो बिना माँगे जो कुछ मिल जाए, उससे संतुष्ट रहता है, द्वंद्वों (सुख-दुःख) से अतीत है, ईर्ष्या रहित है और सफलता तथा असफलता में समान रहता है, ऐसा व्यक्ति कर्म करने पर भी नहीं बँधता।

श्लोक : २३

अनुवाद: जिसकी आसक्ति पूरी तरह से चली गई है, जो मुक्त हो गया है और जिसका मन ज्ञान में स्थित हो गया है, ऐसे व्यक्ति का यज्ञ के लिए किया गया संपूर्ण कर्म पूर्ण रूप से विलीन हो जाता है।

श्लोक : २४

अनुवाद: जिस यज्ञ में अर्पण भी ब्रह्म है, हवि भी ब्रह्म है, ब्रह्म रूपी अग्नि में ब्रह्म द्वारा ही हवन किया जाता है, ऐसे ब्रह्म रूपी कर्म में स्थित हुए पुरुष द्वारा प्राप्त करने योग्य फल भी ब्रह्म ही है।

श्लोक : २५

अनुवाद: दूसरे योगीजन देवताओं के पूजन रूपी यज्ञ का ही अनुष्ठान करते हैं, और अन्य योगीजन ब्रह्म रूपी अग्नि में यज्ञ द्वारा ही यज्ञ का हवन करते हैं।

श्लोक : २६

अनुवाद: कुछ योगी अपनी श्रोत्र आदि इंद्रियों को संयम रूपी अग्नि में हवन करते हैं, और दूसरे योगी शब्द आदि विषयों को इंद्रिय रूपी अग्नि में हवन करते हैं।

श्लोक : २७

अनुवाद: दूसरे कुछ योगीजन सभी इंद्रियों की क्रियाओं को और प्राणों की क्रियाओं को भी ज्ञान से प्रज्ज्वलित आत्मसंयम रूपी योग अग्नि में हवन करते हैं।

श्लोक : २८

अनुवाद: कुछ लोग द्रव्ययज्ञ करने वाले होते हैं, कुछ तप रूपी यज्ञ करने वाले होते हैं, और कुछ योग रूपी यज्ञ करने वाले होते हैं। दूसरे कुछ कठोर व्रत वाले यत्नशील पुरुष स्वाध्याय रूपी ज्ञान यज्ञ करने वाले होते हैं।

श्लोक : २९

अनुवाद: दूसरे कुछ प्राणायाम में लगे हुए योगी अपान वायु में प्राण वायु का और प्राण वायु में अपान वायु का हवन करते हैं, और कुछ प्राण तथा अपान दोनों की गति को रोककर हवन करते हैं।

श्लोक : ३०

अनुवाद: दूसरे कुछ नियंत्रित आहार वाले योगी प्राणों को प्राणों में ही हवन करते हैं। ये सभी यज्ञों को जानने वाले हैं और यज्ञों द्वारा जिनके पाप नष्ट हो गए हैं।

श्लोक : ३१

अनुवाद: यज्ञ से बचे हुए अमृत का अनुभव करने वाले योगी सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। हे कुरुश्रेष्ठ! यज्ञ न करने वाले के लिए यह लोक भी सुखदायक नहीं है, तो फिर परलोक कहाँ से मिलेगा?

श्लोक : ३२

अनुवाद: इस प्रकार अनेक प्रकार के यज्ञ वेद की वाणी में विस्तृत हैं। उन सबको तू कर्म से उत्पन्न होने वाला जान, ऐसा जानकर तू मोक्ष को प्राप्त होगा।

श्लोक : ३३

अनुवाद: हे परंतप (अर्जुन)! द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञानमय यज्ञ श्रेष्ठ है, क्योंकि हे पार्थ! संपूर्ण कर्म बिना किसी अपवाद के ज्ञान में ही समाप्त हो जाते हैं।

श्लोक : ३४

अनुवाद: उस ज्ञान को तू तत्त्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझ। उनको भलीभाँति प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से और सरलतापूर्वक प्रश्न पूछने से वे ज्ञानी तुझे तत्त्वज्ञान का उपदेश देंगे।

श्लोक : ३५

अनुवाद: हे पाण्डव (अर्जुन)! जिस ज्ञान को जानकर तू फिर इस प्रकार मोह को प्राप्त नहीं होगा। जिस ज्ञान के प्रभाव से तू सभी प्राणियों को अपनी आत्मा में और फिर मुझमें देखेगा।

श्लोक : ३६

अनुवाद: यदि तू सभी पापियों में भी सबसे बड़ा पापी है, तब भी तू ज्ञान रूपी नौका से सभी पाप रूपी सागर को अच्छी तरह पार कर जाएगा।

श्लोक : ३७

अनुवाद: हे अर्जुन! जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि ईंधन को भस्म कर देती है, उसी प्रकार ज्ञान रूपी अग्नि सभी कर्मों को भस्म कर देती है।

श्लोक : ३८

अनुवाद: निश्चय ही इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र कुछ भी नहीं है। उस ज्ञान को योग में सिद्ध हुआ मनुष्य स्वयं ही अपने आप में प्राप्त कर लेता है।

श्लोक : ३९

अनुवाद: श्रद्धावान, तत्पर रहने वाला और इंद्रियों को वश में रखने वाला मनुष्य ज्ञान को प्राप्त करता है। ज्ञान को प्राप्त करके वह शीघ्र ही परम शांति को प्राप्त हो जाता है।

श्लोक : ४०

अनुवाद: विवेकहीन, अश्रद्धावान और संशय युक्त मनुष्य नष्ट हो जाता है। ऐसे संशय युक्त व्यक्ति के लिए न तो यह लोक है, न परलोक है और न ही सुख है।

श्लोक : ४१

अनुवाद: हे धनंजय! जिसने योग द्वारा सभी कर्मों को त्याग दिया है, जिसने ज्ञान द्वारा अपने सभी संदेहों को नष्ट कर दिया है, ऐसे आत्मज्ञानी व्यक्ति को कर्म नहीं बाँधते।

श्लोक : ४२

अनुवाद: इसलिए, तू अपने हृदय में स्थित इस अज्ञान से उत्पन्न संशय को ज्ञान रूपी तलवार से काटकर, हे भारत (अर्जुन)! योग का आश्रय लेकर युद्ध के लिए खड़ा हो जा।

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