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श्रीमद्भगवद्गीता

"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन मा कर्मफलहेतुर्भूमा ते संगोऽस्त्वकर्मणि"

पाँचवाँ अध्याय : कर्म-सन्यास-योग || Karma Sanyasa Yoga

श्लोक : 0१

अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे कृष्ण! आप पहले कर्मों के संन्यास की प्रशंसा करते हैं और फिर कर्मयोग की। इन दोनों में से जो एक मेरे लिए अधिक कल्याणकारी हो, वह निश्चित करके मुझे बताइए।

श्लोक : 0

अनुवाद: श्रीभगवान ने कहा: संन्यास (कर्मों का त्याग) और कर्मयोग (फल की इच्छा के बिना कर्म करना), ये दोनों ही परम कल्याणकारी हैं। परंतु इन दोनों में कर्म-सन्यास की अपेक्षा कर्मयोग श्रेष्ठ है।

श्लोक : 0

अनुवाद: हे महाबाहो (अर्जुन)! जो न तो किसी से द्वेष करता है और न किसी वस्तु की कामना करता है, उस पुरुष को नित्य संन्यासी समझना चाहिए। वह द्वंद्वों (सुख-दुःख) से रहित होकर सुखपूर्वक बंधन से मुक्त हो जाता है।

श्लोक : 0

अनुवाद: अज्ञानी लोग ही सांख्य (ज्ञानयोग) और योग (कर्मयोग) को अलग-अलग कहते हैं, ज्ञानी नहीं। क्योंकि दोनों में से एक मार्ग का भी सही ढंग से अनुसरण करने वाला दोनों का फल प्राप्त कर लेता है।

श्लोक : 0

अनुवाद: सांख्ययोगियों द्वारा जो स्थान (मोक्ष) प्राप्त किया जाता है, वही कर्मयोगियों द्वारा भी प्राप्त किया जाता है। इसलिए जो सांख्य और योग को एक ही देखता है, वही सही देखता है।

श्लोक : 0

अनुवाद: हे महाबाहो! कर्मयोग के बिना संन्यास (कर्म-त्याग) को प्राप्त करना कठिन है। परंतु कर्मयोग में लगा हुआ मुनि (मननशील) शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।

श्लोक : 0

अनुवाद: जो कर्मयोग में लगा हुआ है, जिसका मन शुद्ध है, जिसने अपनी आत्मा को जीत लिया है और जिसने इंद्रियों को वश में कर लिया है, वह सभी प्राणियों की आत्मा को अपनी आत्मा में देखता हुआ कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होता।

अनुवाद: तत्त्व को जानने वाला कर्मयोगी देखते, सुनते, स्पर्श करते, सूँघते, खाते, चलते, सोते, साँस लेते, बोलते, त्यागते, ग्रहण करते और आँखें खोलते-बंद करते हुए भी मन में यही मानता है कि मैं कुछ भी नहीं करता, क्योंकि वह जानता है कि इंद्रियाँ ही अपने-अपने विषयों में बरत रही हैं।

अनुवाद: जो मनुष्य सभी कर्मों को ब्रह्म में समर्पित करके, आसक्ति को त्यागकर कर्म करता है, वह पाप से वैसे ही अलिप्त रहता है, जैसे कमल का पत्ता जल से अलिप्त रहता है।

श्लोक : ११

अनुवाद: योगी लोग शरीर, मन, बुद्धि और केवल इंद्रियों से भी आसक्ति को त्यागकर आत्मशुद्धि के लिए कर्म करते हैं।

श्लोक : १२

अनुवाद: कर्मयोगी कर्मों के फल को त्यागकर परम शांति को प्राप्त करता है, जबकि अज्ञानी व्यक्ति कामना के कारण फल में आसक्त होकर बँध जाता है।

श्लोक : १३

अनुवाद: अपने वश में किए हुए मन वाला देहधारी (ज्ञानी पुरुष) न करते हुए और न कराते हुए भी सभी कर्मों का मानसिक त्याग करके नौ द्वारों वाले शरीर रूपी नगर में सुखपूर्वक रहता है।

श्लोक : १४

अनुवाद: परमात्मा न तो मनुष्यों के लिए कर्तृत्व, न कर्मों और न कर्मफल के साथ संबंध की रचना करते हैं, बल्कि ये सब प्रकृति के स्वभाव से ही होते हैं।

श्लोक : १५

अनुवाद: सर्वव्यापी ईश्वर न तो किसी के पाप को ग्रहण करते हैं और न ही किसी के पुण्य को। अज्ञान द्वारा ज्ञान ढँका हुआ है, इसलिए सभी प्राणी मोहित होते हैं।

श्लोक : १६

अनुवाद: परंतु जिनका वह अज्ञान आत्मज्ञान द्वारा नष्ट हो गया है, उनका वह ज्ञान सूर्य के समान उस परम सत्य को प्रकाशित कर देता है।

श्लोक : १७

अनुवाद: जिसकी बुद्धि उसमें लगी हुई है, जिसकी आत्मा उसमें लगी हुई है, जो उसमें ही स्थित हैं और उसी को अपना परम लक्ष्य मानते हैं, वे ज्ञान द्वारा अपने सभी पापों को धोकर पुनर्जन्म से रहित होकर परम गति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक : १८

अनुवाद: ज्ञानी लोग विद्या और विनय से युक्त ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चांडाल को भी समान दृष्टि से देखते हैं।

श्लोक : १९

अनुवाद: जिनका मन समानता में स्थित है, उन्होंने यहीं संसार को जीत लिया है, क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है। इसलिए वे ब्रह्म में ही स्थित हैं।

श्लोक : २०

अनुवाद: जो ब्रह्म को जानने वाला पुरुष ब्रह्म में स्थित है, वह प्रिय वस्तु को प्राप्त करके न तो हर्षित होता है और न अप्रिय वस्तु को पाकर विचलित होता है। उसकी बुद्धि स्थिर और मोह रहित होती है।

श्लोक : २१

अनुवाद: जिसकी आत्मा बाहरी विषयों के स्पर्श में आसक्त नहीं होती, वह अपनी आत्मा में ही सुख प्राप्त करता है। वह ब्रह्मयोग में स्थित हुआ पुरुष अविनाशी सुख का अनुभव करता है।

श्लोक : २२

अनुवाद: हे कुंतीपुत्र! जो विषयों के स्पर्श से उत्पन्न होने वाले भोग हैं, वे दुःख के ही कारण हैं, क्योंकि उनका आदि और अंत होता है। इसलिए ज्ञानी पुरुष उनमें रमण नहीं करता।

श्लोक : २३

अनुवाद: जो मनुष्य इस शरीर को त्यागने से पहले ही काम और क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है, वही योगी है और वही सुखी है।

श्लोक : २४

अनुवाद: जो अंदर से ही सुखी है, अंदर ही रमण करता है और जो अंदर ही ज्योति वाला है, वह योगी ब्रह्मभूत होकर ब्रह्मनिर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त होता है।

श्लोक : २५

अनुवाद: जिनके सभी पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके सभी संदेह दूर हो गए हैं, जो जितेंद्रिय हैं और जो सभी प्राणियों के हित में लगे हुए हैं, ऐसे ऋषि ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त करते हैं।

श्लोक : २६

अनुवाद: काम और क्रोध से रहित, मन को वश में किए हुए और आत्मज्ञान को जानने वाले यति (संन्यासी) के लिए ब्रह्मनिर्वाण हर तरफ से प्राप्त होता है।

श्लोक : २७२८

अनुवाद: बाहरी विषयों को बाहर ही छोड़कर, आँखों को भौहों के बीच में स्थिर करके, नाक के अंदर चलने वाले प्राण और अपान वायु को समान करके, जिसने इंद्रियों, मन और बुद्धि को वश में कर लिया है, जो मोक्ष को अपना लक्ष्य मानता है, और जो इच्छा, भय और क्रोध से रहित है, वह मुनि सदा मुक्त ही रहता है।

श्लोक : २९

अनुवाद: जो मुझे यज्ञों और तपस्याओं का भोक्ता, सभी लोकों का महान ईश्वर और सभी प्राणियों का मित्र जानकर, वह शांति को प्राप्त होता है।

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