Skip to content

श्रीमद्भगवद्गीता

"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन मा कर्मफलहेतुर्भूमा ते संगोऽस्त्वकर्मणि"

छठा अध्याय : आत्मसंयम योग (ध्यान योग) || Dhyan Yoga

श्लोक : 0१

अनुवाद: श्रीभगवान ने कहा: जो व्यक्ति कर्मफल का आश्रय न लेकर अपने कर्तव्य कर्म करता है, वही संन्यासी और योगी है, न कि वह जो अग्नि का त्याग करता है और न वह जो क्रियारहित है।

श्लोक : 0

अनुवाद: हे पाण्डव! जिसे संन्यास कहते हैं, उसी को तू योग जान। क्योंकि संकल्पों का त्याग किए बिना कोई भी योगी नहीं बन सकता।

श्लोक : 0

अनुवाद: योग में आरूढ़ होने की इच्छा रखने वाले मुनि के लिए कर्म साधन कहा जाता है। और योग में आरूढ़ होने पर उसी के लिए मन और इंद्रियों का शांत होना साधन कहा जाता है।

श्लोक : 0

अनुवाद: जब यह व्यक्ति इंद्रियों के विषयों और कर्मों में आसक्त नहीं होता, और सभी संकल्पों का त्याग कर देता है, तब वह योग में आरूढ़ हुआ कहा जाता है।

श्लोक : 0

अनुवाद: मनुष्य को अपने आप से अपना उद्धार करना चाहिए, अपने आपको पतन की ओर नहीं ले जाना चाहिए। क्योंकि यह आत्मा ही अपना मित्र है और यह आत्मा ही अपना शत्रु है।

श्लोक : 0

अनुवाद: जिसने अपने मन को जीत लिया है, उसके लिए आत्मा ही उसका मित्र है। परंतु जिसने मन को नहीं जीता, उसके लिए आत्मा शत्रु के समान ही व्यवहार करती है।

श्लोक : 0

अनुवाद: जिसने अपने मन को जीत लिया है और जो शांत है, उसके लिए परमात्मा सर्दी, गर्मी, सुख, दुःख तथा मान और अपमान में भी स्थिर रहता है।

श्लोक : 0

अनुवाद: जो ज्ञान और विज्ञान से संतुष्ट है, जो अचल है, जिसने इंद्रियों को जीत लिया है, और जो मिट्टी, पत्थर तथा सोने को समान मानता है, वह योगी युक्त कहा जाता है।

श्लोक : 0

अनुवाद: सुहृद (भलाई चाहने वाला), मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष करने वाले, संबंधी, साधु और पापियों में समान बुद्धि रखने वाला श्रेष्ठ है।

श्लोक : १०

अनुवाद: योगी को एकांत में अकेले रहकर, मन और आत्मा को नियंत्रित करते हुए, आशा और संग्रह से रहित होकर निरंतर ध्यान का अभ्यास करना चाहिए।

श्लोक : ११-१२

अनुवाद: पवित्र स्थान पर, न अधिक ऊँचा और न अधिक नीचा, कुश, मृगचर्म और वस्त्र से ढँका हुआ अपना आसन स्थापित करके, उस आसन पर बैठकर, मन को एकाग्र करके, मन और इंद्रियों की क्रियाओं को वश में करते हुए आत्मशुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे।

श्लोक : १३

अनुवाद: अपने शरीर, सिर और गर्दन को समान रूप से सीधा और स्थिर रखकर, अपनी नासिका के अग्र भाग पर दृष्टि रखकर और दूसरी दिशाओं को न देखते हुए…

श्लोक : १४

अनुवाद: …शांत मन वाला, भय रहित, ब्रह्मचर्य के व्रत में स्थित होकर, मन को वश में करके, मेरे में चित्त लगाकर, मेरे परायण होकर बैठे।

श्लोक : १५

अनुवाद: इस प्रकार मन को वश में किए हुए योगी हमेशा आत्मा को युक्त करते हुए मुझमें स्थित रहने वाली परम शांति (ब्रह्मनिर्वाण) को प्राप्त करता है।

श्लोक : १६

अनुवाद: हे अर्जुन! यह योग न तो बहुत अधिक खाने वाले के लिए है और न ही बिल्कुल न खाने वाले के लिए। और न ही बहुत अधिक सोने वाले के लिए और न ही हमेशा जागने वाले के लिए है।

श्लोक : १७

अनुवाद: जो व्यक्ति आहार और विहार में, कर्मों में चेष्टाओं में, सोने और जागने में संयमित है, उसके लिए योग दुःख का नाश करने वाला होता है।

श्लोक : १८

अनुवाद: जब अच्छी तरह से नियंत्रित मन आत्मा में ही स्थिर हो जाता है, और सभी कामनाओं से रहित हो जाता है, तब वह व्यक्ति युक्त (योगी) कहा जाता है।

श्लोक : १९

अनुवाद: जिस प्रकार वायु रहित स्थान में रखा हुआ दीपक हिलता नहीं, वही उपमा आत्मा के योग का अभ्यास करते हुए नियंत्रित मन वाले योगी की मानी गई है।

श्लोक : २०

अनुवाद: जिस अवस्था में योग के अभ्यास से शांत हुआ चित्त स्थिर हो जाता है, और जिस अवस्था में आत्मा से आत्मा को देखते हुए वह संतुष्ट होता है…

श्लोक : २१

अनुवाद: …और जिस अवस्था में वह इंद्रियों से परे, बुद्धि से अनुभव किए जाने वाले परम सुख को जानता है, तथा जिसमें स्थित होकर वह तत्त्व से विचलित नहीं होता…

श्लोक : २২

अनुवाद: …और जिस लाभ को पाकर वह उससे अधिक कोई दूसरा लाभ नहीं मानता, तथा जिसमें स्थित होकर वह बड़े से बड़े दुःख से भी विचलित नहीं होता…

श्लोक : २३

अनुवाद: …उसी दुःख के संयोग से वियोग को योग नाम से जानना चाहिए। वह योग, बिना उकताए हुए मन से निश्चयपूर्वक करना चाहिए।

श्लोक : २४

अनुवाद: संकल्प से उत्पन्न होने वाली सभी कामनाओं को पूरी तरह से त्यागकर, मन से ही सभी इंद्रियों के समूह को सभी ओर से वश में करके…

श्लोक : २५

अनुवाद: …धीरे-धीरे अभ्यास करते हुए धैर्य युक्त बुद्धि द्वारा मन को शांत करना चाहिए। मन को आत्मा में स्थित करके कुछ भी चिंतन न करे।

श्लोक : २६

अनुवाद: “यह चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भी जाता है, वहाँ-वहाँ से इसे हटाकर आत्मा में ही वश में करना चाहिए।”

श्लोक : २७

अनुवाद: “क्योंकि, शांत मन वाला, शांत रजोगुण वाला, पाप रहित और ब्रह्मस्वरूप हुआ यह योगी उत्तम सुख को प्राप्त होता है।”

श्लोक : २८

अनुवाद: इस प्रकार निरंतर आत्मा को योग में लगाते हुए पाप रहित योगी अत्यंत सुखपूर्वक ब्रह्म के स्पर्श से उत्पन्न होने वाले सुख का अनुभव करता है।

श्लोक : २९

अनुवाद: योग में स्थित आत्मा वाला और सब जगह समान देखने वाला योगी अपनी आत्मा को सभी प्राणियों में स्थित और सभी प्राणियों को अपनी आत्मा में देखता है।

श्लोक : ३०

अनुवाद: जो मुझे सभी जगह देखता है और सभी को मुझमें देखता है, उसके लिए मैं कभी अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिए कभी अदृश्य नहीं होता।

श्लोक : ३१

अनुवाद: जो योगी सभी प्राणियों में स्थित मुझे एक रूप में भजता है, वह योगी सभी प्रकार से मेरे में ही रहता है।

श्लोक : ३२

अनुवाद: हे अर्जुन! जो योगी अपनी ही उपमा से सभी जगह समान देखता है और सभी के सुख-दुःख को समान समझता है, वह परम योगी माना गया है।

श्लोक : ३३

अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे मधुसूदन! जो यह योग आपने समानता से बताया है, मन के चंचल होने के कारण मैं इसकी स्थिर स्थिति को नहीं देखता।

श्लोक : ३४

अनुवाद: हे कृष्ण! मन बड़ा चंचल, अशांत करने वाला, बलवान और हठी है। इसका निग्रह करना मैं वायु को वश में करने के समान अत्यंत कठिन मानता हूँ।

श्लोक : ३५

अनुवाद: श्रीभगवान ने कहा: हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल और वश में करना कठिन है। परंतु हे कुंतीपुत्र! अभ्यास और वैराग्य से इसे वश में किया जा सकता है।

श्लोक : ३६

अनुवाद: जिसने मन को वश में नहीं किया है, उसके लिए योग प्राप्त करना कठिन है, यह मेरा मत है। परंतु वश में किए हुए मन वाले के लिए प्रयत्न करने पर सही उपाय से इसे प्राप्त करना संभव है।

श्लोक : ३७

अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे कृष्ण! जो व्यक्ति श्रद्धा रखता है, परंतु प्रयत्नशील नहीं होने के कारण जिसका मन योग से विचलित हो गया है, वह योग की सिद्धि को प्राप्त न होकर किस गति को जाता है?

श्लोक : ३८

अनुवाद: हे महाबाहो! क्या वह ब्रह्म के मार्ग में मोहित और निराश्रय होकर, छिन्न-भिन्न बादल की तरह दोनों तरफ से भ्रष्ट होकर नष्ट तो नहीं हो जाता?

श्लोक : ३९

अनुवाद: हे कृष्ण! मेरे इस संशय को पूरी तरह से दूर करने के योग्य आप ही हैं। क्योंकि आपके सिवा इस संशय को दूर करने वाला दूसरा कोई नहीं है।

श्लोक : ४०

अनुवाद: श्रीभगवान ने कहा: हे पार्थ! ऐसे व्यक्ति का न तो इस लोक में और न ही परलोक में विनाश होता है। क्योंकि हे प्रिय! कल्याणकारी कर्म करने वाला कोई भी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।

श्लोक : ४१

अनुवाद: वह योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवानों के लोकों में पहुँचकर और वहाँ बहुत वर्षों तक निवास करके, फिर से पवित्र और श्रीमानों के घर में जन्म लेता है।

श्लोक : ४२

अनुवाद: अथवा वह बुद्धिमान योगियों के कुल में ही जन्म लेता है। इस प्रकार का जन्म संसार में बहुत ही दुर्लभ है।

श्लोक : ४३

अनुवाद: हे कुरुनंदन! वहाँ वह पिछले जन्म में प्राप्त हुई बुद्धि को फिर से प्राप्त करता है और उसके बाद सिद्धि के लिए और भी अधिक प्रयत्न करता है।

श्लोक : ४४

अनुवाद: वह पिछले जन्म के अभ्यास से विवश होकर भी योग की ओर खींचा चला जाता है। योग के स्वरूप को जानने की इच्छा रखने वाला भी वेदों में कहे गए कर्मफल को पार कर जाता है।

श्लोक : ४५

अनुवाद: लेकिन जो योगी सभी पापों को धोकर प्रयत्नपूर्वक साधना करता है, वह अनेक जन्मों के अभ्यास से सिद्ध होकर परम गति को प्राप्त होता है।

श्लोक : ४६

अनुवाद: योगी तपस्वियों से, ज्ञानियों से और कर्म करने वालों से भी श्रेष्ठ माना गया है। इसलिए हे अर्जुन! तू योगी बन।

श्लोक : ४७

अनुवाद: सभी योगियों में भी जो श्रद्धावान होकर मुझमें स्थित अंतरात्मा से मुझको भजता है, वह मुझे सबसे श्रेष्ठ योगी मान्य है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *