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श्रीमद्भगवद्गीता

"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन मा कर्मफलहेतुर्भूमा ते संगोऽस्त्वकर्मणि"

चौदहवाँ अध्याय : गुणत्रय-विभाग-योग || Gunatraya Vibhaga Yoga

श्लोक : 0

अनुवाद: श्रीभगवान ने कहा: मैं तुम्हें फिर से सभी ज्ञानों में उत्तम और परम ज्ञान बताऊँगा, जिसे जानकर सभी मुनि इस संसार से परम सिद्धि को प्राप्त हुए हैं।

श्लोक : 0

अनुवाद: इस ज्ञान का आश्रय लेकर, मेरे स्वरूप को प्राप्त हुए लोग सृष्टि के आरंभ में फिर से उत्पन्न नहीं होते और प्रलयकाल में भी व्यथित नहीं होते।

श्लोक : 0

अनुवाद: हे भरतवंशी (अर्जुन)! मेरी योनि (जन्म स्थान) प्रकृति है, और मैं उसमें गर्भ स्थापित करता हूँ। उसी से सभी प्राणियों की उत्पत्ति होती है।

श्लोक : 0

अनुवाद: हे कुंतीपुत्र! सभी योनियों में जितनी भी मूर्तियाँ उत्पन्न होती हैं, उन सबकी योनि तो प्रकृति है और मैं बीज देने वाला पिता हूँ।

श्लोक : 0

अनुवाद: हे महाबाहो (अर्जुन)! सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण प्रकृति से उत्पन्न होते हैं, और ये ही इस अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं।

श्लोक : 0

अनुवाद: हे निष्पाप! उन तीनों में सत्त्वगुण निर्मल होने के कारण प्रकाश देने वाला और निरोग होता है। यह सुख की आसक्ति और ज्ञान की आसक्ति से जीवात्मा को बाँधता है।

श्लोक : 0

अनुवाद: हे कुंतीपुत्र! रजोगुण को तुम कामना से उत्पन्न हुआ जानो, जो तृष्णा (लालसा) और आसक्ति को उत्पन्न करता है। यह जीवात्मा को कर्मों की आसक्ति से बाँधता है।

श्लोक : 0

अनुवाद: हे भारत! तमोगुण को तुम अज्ञान से उत्पन्न हुआ जानो, जो सभी देहधारियों को मोहित करता है। यह प्रमाद (लापरवाही), आलस्य और निद्रा द्वारा जीवात्मा को बाँधता है।

श्लोक : 0

अनुवाद: हे भारत! सत्त्वगुण सुख में लगाता है, रजोगुण कर्म में लगाता है, और तमोगुण तो ज्ञान को ढककर प्रमाद में लगाता है।

श्लोक : १०

अनुवाद: हे भारत! रज और तम को दबाकर सत्त्वगुण बढ़ता है, रजोगुण सत्त्व और तम को दबाकर बढ़ता है, और तमोगुण सत्त्व और रज को दबाकर बढ़ता है।

श्लोक : ११

अनुवाद: जब इस शरीर के सभी द्वारों (इंद्रियों) में ज्ञान रूपी प्रकाश उत्पन्न होता है, तब यह समझना चाहिए कि सत्त्वगुण बढ़ा हुआ है।

श्लोक : १२

अनुवाद: हे भरतश्रेष्ठ! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति (कार्य करने की इच्छा), कर्मों का आरंभ, अशांति और विषयों की लालसा—ये सब उत्पन्न होते हैं।

श्लोक : १३

अनुवाद: हे कुरुनंदन! तमोगुण के बढ़ने पर अज्ञान (अंधकार), अकर्मण्यता, प्रमाद (लापरवाही) और मोह—ये सब उत्पन्न होते हैं।

श्लोक : १४

अनुवाद: जब सत्त्वगुण बढ़ा हुआ हो और उस समय देहधारी मृत्यु को प्राप्त होता है, तब वह उत्तम ज्ञानियों के निर्मल लोकों को प्राप्त होता है।

श्लोक : १५

अनुवाद: रजोगुण के बढ़ने पर मृत्यु को प्राप्त होकर वह कर्मों में आसक्ति रखने वाले मनुष्यों में जन्म लेता है। और उसी प्रकार तमोगुण में लीन होकर मरने वाला मूर्ख प्राणियों की योनियों में जन्म लेता है।

श्लोक : १६

अनुवाद: सात्त्विक कर्म का फल निर्मल और सुखदायी कहा गया है। रजोगुण का फल दुःख है और तमोगुण का फल अज्ञान है।

श्लोक :

अनुवाद: सत्त्व से ज्ञान उत्पन्न होता है, रज से लोभ उत्पन्न होता है, और तम से प्रमाद (लापरवाही), मोह तथा अज्ञान ही उत्पन्न होते हैं।

श्लोक : १८

अनुवाद: सत्त्वगुण में स्थित लोग ऊपर (स्वर्ग आदि) जाते हैं, राजसी लोग मध्य में (मनुष्य लोक में) रहते हैं, और तामसी लोग निकृष्ट वृत्तियों में रहने के कारण नीचे (नरकों में) जाते हैं।

श्लोक : १९

अनुवाद: जब द्रष्टा (ज्ञानवान) गुणों के अलावा किसी और को कर्ता नहीं देखता और गुणों से परे मुझे जानता है, तब वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।

श्लोक : २०

अनुवाद: देहधारी पुरुष शरीर को उत्पन्न करने वाले इन तीनों गुणों को पार करके जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और सभी दुःखों से मुक्त होकर अमृत (मोक्ष) का भोग करता है।

श्लोक : २१

अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे प्रभु! इन तीनों गुणों से अतीत हुआ व्यक्ति किन लक्षणों से जाना जाता है? उसका आचरण कैसा होता है और वह इन तीनों गुणों को कैसे पार करता है?

श्लोक : २२

अनुवाद: श्रीभगवान ने कहा: हे पाण्डव! जो पुरुष प्रकाश (सत्त्वगुण का फल), प्रवृत्ति (रजोगुण का फल) और मोह (तमोगुण का फल) के उत्पन्न होने पर उनसे द्वेष नहीं करता और उनके शांत होने पर उनकी इच्छा नहीं करता…

श्लोक : २३

अनुवाद: …जो उदासीन के समान स्थित रहता है और गुणों द्वारा विचलित नहीं होता; जो यह जानकर कि ‘गुण ही अपना कार्य कर रहे हैं’ इस निश्चय पर अडिग रहता है और हिलता नहीं है…

श्लोक : २४

अनुवाद: …जो दुःख और सुख को समान मानता है, जो अपनी आत्मा में स्थित है, जिसके लिए मिट्टी, पत्थर और सोना समान हैं; जो प्रिय और अप्रिय को समान मानता है और जो अपनी निंदा और प्रशंसा को समान मानता है…

श्लोक : २५

अनुवाद: …जो मान और अपमान में समान रहता है, जो मित्र और शत्रु के पक्ष में समान रहता है, और जो सभी कर्मों के आरंभ का त्याग कर चुका है, वह पुरुष गुणातीत कहलाता है।

श्लोक : २६

अनुवाद: जो पुरुष मुझको अव्यभिचारी (अनन्य) भक्तियोग से भजता है, वह इन तीनों गुणों को पार करके ब्रह्मभाव को प्राप्त करने के योग्य हो जाता है।

श्लोक : २७

अनुवाद: क्योंकि मैं ही उस अविनाशी ब्रह्म का, अमृत का, सनातन धर्म का और एकांतिक सुख का आश्रय (आधार) हूँ।

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