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श्रीमद्भगवद्गीता

"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन मा कर्मफलहेतुर्भूमा ते संगोऽस्त्वकर्मणि"

पंद्रहवाँ अध्याय : पुरुषोत्तम-योग || Purushottam Yoga

श्लोक : 0

अनुवाद: श्रीभगवान ने कहा: जिसका मूल (जड़) ऊपर की ओर है और जिसकी शाखाएँ नीचे की ओर हैं, उस संसार रूपी अविनाशी पीपल के वृक्ष को (ज्ञानियों ने) कहा है। वेद जिसके पत्ते हैं, जो उस वृक्ष को जानता है, वह वेद का तत्त्व जानने वाला है।

श्लोक : 0

अनुवाद: उस वृक्ष की शाखाएँ नीचे और ऊपर फैली हुई हैं, जो गुणों द्वारा बढ़ी हैं, जिनके विषय-भोग ही कोंपलें हैं। मनुष्यलोक में कर्मों के अनुसार नीचे की ओर भी उसकी जड़ें फैली हुई हैं।

श्लोक : 0

अनुवाद: इस संसार वृक्ष का स्वरूप यहाँ (इस लोक में) जैसा है, वैसा नहीं पाया जाता; न तो इसका आदि (शुरुआत) है, न अंत और न ही कोई आधार। इस अति दृढ़ जड़ों वाले पीपल के वृक्ष को अनासक्ति रूपी मजबूत शस्त्र से काट कर…

श्लोक : 0

अनुवाद: …उसके बाद उस परम पद को खोजना चाहिए, जहाँ जाने पर मनुष्य फिर लौटकर नहीं आता। मैं उसी आदि पुरुष की शरण में हूँ, जिससे इस पुरानी संसार-प्रवृत्ति का विस्तार हुआ है।

श्लोक : 0

अनुवाद: जिनका मान और मोह नष्ट हो गया है, जिन्होंने आसक्ति के दोष को जीत लिया है, जो अध्यात्म ज्ञान में हमेशा स्थित हैं, जिनकी कामनाएँ पूरी तरह से शांत हो गई हैं, और जो सुख-दुःख आदि द्वंद्वों से मुक्त हैं, वे ज्ञानीजन उस अविनाशी परम पद को प्राप्त होते हैं।

श्लोक : 0

अनुवाद: उस परम पद को न तो सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चंद्रमा और न अग्नि। जिसे प्राप्त करके मनुष्य फिर वापस नहीं लौटते, वही मेरा परम धाम है।

श्लोक : 0

अनुवाद: इस जीवलोक में यह सनातन जीव मेरा ही अंश है। वही प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इंद्रियों को अपनी ओर खींचता है।

श्लोक : 0

अनुवाद: जब यह जीव (आत्मा) एक शरीर को प्राप्त करता है और जब इसे छोड़कर जाता है, तो वह इन (मन और इंद्रियों) को वैसे ही साथ ले जाता है, जैसे वायु गंधों को अपने आश्रय से ले जाती है।

श्लोक : 0

अनुवाद: यह जीवात्मा कान, आँख, स्पर्श, रसना (जीभ) और नाक तथा मन का आश्रय लेकर ही विषयों का उपभोग करता है।

श्लोक : १०

अनुवाद: शरीर को छोड़कर जाते हुए, शरीर में स्थित रहते हुए, या गुणों से युक्त होकर विषयों का भोग करते हुए इस आत्मा को अज्ञानी लोग नहीं देख पाते, परंतु ज्ञान की आँखों वाले ही इसे देख पाते हैं।

श्लोक : ११

अनुवाद: जो प्रयत्नशील योगी हैं, वे इस आत्मा को अपने अंदर ही स्थित देखते हैं। परंतु जो अज्ञानी और असंयमी हैं, वे प्रयत्न करने पर भी इसे नहीं देख पाते।

श्लोक : १२

अनुवाद: सूर्य में स्थित जो तेज संपूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है, और जो चंद्रमा में तथा अग्नि में है, उस तेज को तू मेरा ही जान।

श्लोक : १३

अनुवाद: मैं पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सभी प्राणियों को धारण करता हूँ, और रसस्वरूप चंद्रमा होकर सभी औषधियों (वनस्पतियों) को पुष्ट करता हूँ।

श्लोक : १४

अनुवाद: मैं सभी प्राणियों के शरीर में स्थित वैश्वानर (जठराग्नि) बनकर, प्राण और अपान वायु से मिलकर चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।

श्लोक : १५

अनुवाद: मैं सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ। मुझसे ही स्मृति (याददाश्त), ज्ञान और उनका अभाव (विस्मृति) होता है। मैं ही सभी वेदों द्वारा जानने योग्य हूँ, मैं ही वेदों का अंत (वेदांत) करने वाला और वेदों को जानने वाला भी हूँ।

श्लोक : १६

अनुवाद: इस लोक में दो प्रकार के पुरुष हैं—एक क्षर (विनाशी) और दूसरा अक्षर (अविनाशी)। सभी प्राणी क्षर हैं और जो कूटस्थ (अविनाशी) हैं, वे अक्षर कहलाते हैं।

श्लोक : १७

अनुवाद: इन दोनों से उत्तम तो एक दूसरा ही पुरुष है, जिसे परमात्मा कहा गया है। वह अविनाशी ईश्वर तीनों लोकों में प्रवेश करके सबको धारण करता है।

श्लोक :

अनुवाद: क्योंकि मैं क्षर (विनाशी) से परे हूँ और अक्षर (अविनाशी) से भी उत्तम हूँ, इसलिए मैं इस लोक में और वेदों में पुरुषोत्तम (उत्तम पुरुष) के नाम से प्रसिद्ध हूँ।

श्लोक : १९

अनुवाद: हे भारत! जो पुरुष मुझको इस प्रकार मोह रहित होकर पुरुषोत्तम जानता है, वह सब कुछ जानने वाला होकर सभी प्रकार से मेरा ही भजन करता है।

श्लोक : २०

अनुवाद: हे निष्पाप! यह अति गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया है। इसको जानकर मनुष्य बुद्धिमान और कृतकृत्य (अपना कर्तव्य पूरा करने वाला) हो जाता है, हे भारत!

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