सोलहवाँ अध्याय : दैवासुर-संपद्-विभाग-योग
श्लोक : 0१–0३
श्रीभगवानुवाच
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्।।१।।
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्।।२।।
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत।।३।।
अनुवाद: श्रीभगवान ने कहा: हे भारत! अभय, अंतःकरण की पूर्ण शुद्धि, ज्ञान और योग में दृढ़ स्थिति, दान, इंद्रियों पर नियंत्रण, यज्ञ, स्वाध्याय (शास्त्रों का अध्ययन), तपस्या, सरलता, अहिंसा, सत्य, क्रोध न करना, त्याग, शांति, चुगली न करना, सभी प्राणियों पर दया, निर्लोभता, नम्रता, लज्जा, चंचलता का अभाव, तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, द्रोह न करना और मान का अभाव—ये सभी गुण दैवी संपदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष में होते हैं।
श्लोक : 0४
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्।।४।।
अनुवाद: हे पार्थ! दंभ, दर्प (घमंड), अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान — ये सब आसुरी संपदा को लेकर उत्पन्न हुए व्यक्ति में होते हैं।
श्लोक : 0५
दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव।।५।।
अनुवाद: दैवी संपदा मोक्ष के लिए मानी गई है और आसुरी संपदा बंधन के लिए। हे पाण्डव! तू शोक मत कर, क्योंकि तू दैवी संपदा को लेकर उत्पन्न हुआ है।
श्लोक : 0६
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे श्रृणु।।६।।
अनुवाद: इस संसार में दो प्रकार के प्राणी हैं—एक दैवी स्वभाव वाले और दूसरे आसुरी स्वभाव वाले। दैवी स्वभाव का विस्तार से वर्णन किया जा चुका है। हे पार्थ! अब आसुरी स्वभाव को मुझसे सुनो।
श्लोक : 0७
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते।।७।।
अनुवाद: आसुरी स्वभाव वाले लोग न तो प्रवृत्ति (सही कर्म) को जानते हैं और न ही निवृत्ति (अकर्म) को। उनमें न तो पवित्रता होती है, न अच्छा आचरण और न ही सत्य।
श्लोक : 0८
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्।।८।।
अनुवाद: वे कहते हैं कि यह जगत् असत्य है, बिना आधार के है, और इसमें कोई ईश्वर नहीं है। यह केवल बिना किसी कारण के, केवल काम-वासना से ही उत्पन्न हुआ है।
श्लोक : 0९
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः।।९।।
अनुवाद: इस प्रकार की दृष्टि का सहारा लेकर, वे नष्ट आत्मा वाले और अल्पबुद्धि के लोग, उग्र कर्म करते हुए, जगत् के नाश के लिए शत्रु बनकर उत्पन्न होते हैं।
श्लोक : १०
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः।
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः।।१०।।
अनुवाद: कभी न पूरी होने वाली कामना का सहारा लेकर, दंभ, मान और मद से युक्त होकर, मोह के कारण असत्य (बुरे) निश्चय को धारण कर, वे अपवित्र व्रतों को करते हुए बुरे कर्मों में प्रवृत्त होते हैं।
श्लोक : ११
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः।
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः।।११।।
अनुवाद: वे प्रलय (मृत्यु) तक रहने वाली अपरिमित चिंताओं का आश्रय लेते हैं, काम-भोग को ही परम लक्ष्य मानते हैं और यह निश्चय रखते हैं कि ‘बस यही सब कुछ है’।
श्लोक : १२
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्।।१२।।
अनुवाद: सैकड़ों आशाओं के जाल में बँधकर, काम और क्रोध के अधीन होकर, वे काम-भोग के लिए अन्याय से धन का संचय करने की इच्छा करते हैं।
श्लोक : १३–१६
इदमद्य मया लब्धमिदं प्राप्स्ये मनोरथम्।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्।।१३।।
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी।।१४।।
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः।।१५।।
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः।
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ।।१६।।
अनुवाद: ‘यह मैंने आज प्राप्त कर लिया, अब मैं उस मनोरथ को प्राप्त करूँगा। यह धन मेरे पास है और भविष्य में यह धन भी मेरा होगा। मैंने उस शत्रु को मार दिया, और दूसरों को भी मारूँगा। मैं ईश्वर हूँ, मैं भोगी हूँ, मैं सिद्ध हूँ, बलवान हूँ और सुखी हूँ। मैं धनी हूँ और मेरे कुल में जन्म हुआ है। मेरे जैसा दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा और आनंद करूँगा।’ — इस प्रकार अज्ञान से मोहित होकर, अनेक प्रकार की चिंताओं से भ्रमित होकर, मोह के जाल में फँसे हुए और काम-भोगों में आसक्त होकर वे अपवित्र नरक में गिरते हैं।
श्लोक : १७
आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्।।१७।।
अनुवाद: वे अपने आप को पूज्य मानने वाले, घमंडी, धन और मान के मद में चूर होकर, बिना विधि-विधान के, केवल दिखावे के लिए नाममात्र के यज्ञ करते हैं।
श्लोक : १८
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः।।१८।।
अनुवाद: वे अहंकार, बल, घमंड, काम और क्रोध का सहारा लेकर, दूसरों के शरीर में और अपने शरीर में स्थित मुझ परमात्मा से द्वेष करते हैं और मेरी निंदा करते हैं।
श्लोक : १९
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु।।१९।।
अनुवाद: उन द्वेष करने वाले, क्रूर, पापमय और मनुष्यों में नीच लोगों को मैं बार-बार इस संसार में आसुरी योनियों में डालता हूँ।
श्लोक : २०
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्।।२०।।
अनुवाद: हे कुंतीपुत्र! वे मूढ़ लोग जन्म-जन्म तक आसुरी योनि को प्राप्त होकर मुझे प्राप्त न होते हुए, उससे भी और नीच गति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक : २१
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्।।२१।।
अनुवाद: नरक के ये तीन द्वार हैं, जो आत्मा का नाश करने वाले हैं—काम, क्रोध और लोभ। इसलिए इन तीनों का त्याग करना चाहिए।
श्लोक : २२
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्।।२२।।
अनुवाद: हे कुंतीपुत्र! इन तीन नरक के द्वारों से मुक्त हुआ मनुष्य अपने लिए कल्याण का आचरण करता है और उसके बाद वह परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक : २३
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्।।२३।।
अनुवाद: जो व्यक्ति शास्त्र के विधि-विधानों को छोड़कर अपनी इच्छा के अनुसार मनमाना आचरण करता है, वह न तो सिद्धि को प्राप्त होता है, न सुख को और न ही परम गति को।
श्लोक : २४
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि।।२४।।
अनुवाद: इसलिए, कौन सा कर्म करना चाहिए और कौन सा नहीं, इसका निर्णय करने में तेरे लिए शास्त्र ही प्रमाण है। यह जानकर, तुझे शास्त्र के विधानों के अनुसार ही कर्म करना चाहिए।
