मोक्ष-संन्यास-योग
अर्जुन उवाच
सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिसूदन।।१।।
अनुवाद: अर्जुन ने कहा – “हे महाबाहो! हे हृषीकेश (इंद्रियों के स्वामी), हे केशि-सूदन (केशि नामक राक्षस को मारने वाले), मैं आपसे संन्यास और त्याग के वास्तविक स्वरूप को अलग-अलग जानना चाहता हूँ।”
श्रीभगवानुवाच
काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः।।२।।
अनुवाद: भगवान ने कहा: “कुछ विद्वानजन कामना-प्रेरित कर्मों के त्याग को संन्यास कहते हैं, जबकि बुद्धिमान लोग सभी कर्मों के फलों के त्याग को त्याग कहते हैं।”
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे।।३।।
अनुवाद: “कुछ विद्वान कहते हैं कि सभी कर्म दोषपूर्ण होने के कारण त्याज्य हैं, जबकि दूसरे (विद्वान) कहते हैं कि यज्ञ, दान और तपस्या जैसे कर्मों का त्याग नहीं करना चाहिए।”
निश्चयं श्रृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः।।४।।
अनुवाद: “हे भरतसत्तम! उस विषय में (कर्मों के त्याग के बारे में) तुम मेरा निश्चित मत सुनो। हे पुरुषव्याघ्र (पुरुषों में श्रेष्ठ)! त्याग निश्चय ही तीन प्रकार का कहा गया है।”
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्।।५।।
अनुवाद: “यज्ञ, दान और तपस्या जैसे कर्मों का त्याग नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें अवश्य करना चाहिए। क्योंकि यज्ञ, दान और तपस्या मनीषियों (विद्वानों) को भी पवित्र करते हैं।”
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्।।६।।
अनुवाद: “परंतु हे पार्थ! ये कर्म (यज्ञ, दान, तपस्या) भी आसक्ति और फल का त्याग करके ही किए जाने चाहिए। यही मेरा निश्चित और सर्वोत्तम मत है।”
नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः।।७।।
अनुवाद: “लेकिन निश्चित (नियमित) कर्मों का त्याग उचित नहीं है। मोहवश उनका त्याग करना ही तामसिक त्याग कहलाता है।”
दुःखमित्येव यत् कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्।।८।।
अनुवाद: “जो व्यक्ति कर्म को दुःखमय मानकर शारीरिक कष्ट के भय से उसका त्याग करता है, वह राजसिक त्याग करता है और त्याग का कोई फल प्राप्त नहीं करता।”
कार्यमित्येव यत् कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन।
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः।।९।।
अनुवाद: “हे अर्जुन! जो नियत कर्म ‘कर्तव्य है’ ऐसा मानकर, आसक्ति और फल का त्याग करके किया जाता है, वह त्याग सात्त्विक कहलाता है।”
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुपजते।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः।।१०।।
अनुवाद: “जो त्यागी सत्त्वगुण से युक्त, बुद्धिमान और जिसका संशय दूर हो गया है, वह अशुभ कर्म से द्वेष नहीं करता और शुभ कर्म में आसक्त नहीं होता।”
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते।।११।।
अनुवाद: “क्योंकि कोई भी देहधारी प्राणी सम्पूर्ण रूप से सभी कर्मों का त्याग नहीं कर सकता। इसलिए, जो व्यक्ति कर्मों के फल का त्याग करता है, वही वास्तव में त्यागी कहलाता है।”
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते।।११।।
अनुवाद: “क्योंकि कोई भी देहधारी प्राणी सम्पूर्ण रूप से सभी कर्मों का त्याग नहीं कर सकता। इसलिए, जो व्यक्ति कर्मों के फल का त्याग करता है, वही वास्तव में त्यागी कहलाता है।”
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे।
सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्।।१३।।
अनुवाद: “हे महाबाहो! सभी कर्मों की सिद्धि (पूर्णता) के लिए सांख्यशास्त्र के सिद्धांत में जो पाँच कारण बताए गए हैं, उन्हें तुम मुझसे जानो।”
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।
विविधाश्च पृथक् चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्।।१४।।
अनुवाद: “अधिष्ठान (शरीर), कर्ता, अलग-अलग प्रकार के करण (इंद्रियाँ), अनेक प्रकार की विभिन्न चेष्टाएँ और पाँचवाँ कारण दैव (परमात्मा) है।”
शरीरवाङ्मनोभिर्यत् कर्म प्रारभते नरः।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः।।१५।।
अनुवाद: “मनुष्य शरीर, वाणी या मन से जो भी कर्म शुरू करता है, चाहे वह उचित हो या अनुचित, उसके ये पाँच ही कारण हैं।”
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः।।१६।।
अनुवाद: “इस तरह पाँच कारणों के होते हुए भी, जो व्यक्ति अपरिष्कृत बुद्धि के कारण स्वयं को ही एकमात्र कर्ता मानता है, वह दुर्मति है और वह यथार्थ में कुछ भी नहीं देखता।”
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते।।१७।।
अनुवाद: “जिसमें ‘मैं कर्ता हूँ’ ऐसा भाव नहीं है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह इन लोकों का वध करके भी न तो वध करता है और न ही बँधता है।”
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः।।१८।।
अनुवाद: “ज्ञान, ज्ञेय (जानने योग्य वस्तु) और परिज्ञाता (जानने वाला) – ये तीन प्रकार के कर्म प्रेरणा के कारण हैं। करण (साधन), कर्म और कर्ता – ये तीन प्रकार के कर्म संग्रह हैं।”
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः।
प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि।।१९।।
अनुवाद: “ज्ञान, कर्म और कर्ता – ये तीनों ही गुणों के भेद से तीन-तीन प्रकार के कहे गए हैं। गुण-भेद को ठीक से समझने के लिए तुम उन सबको भी मुझसे सुनो।”
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्।।२०।।
अनुवाद: “जिस ज्ञान से मनुष्य सभी प्राणियों में एक ही अविनाशी भाव को देखता है, जो विभिन्न प्राणियों में अलग-अलग होते हुए भी अविभाजित है, उस ज्ञान को तुम सात्त्विक जानो।”
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्।।२१।।
অনুবাদঃ যে জ্ঞানের দ্বারা সমস্ত প্রাণীতে ভিন্ন ভিন্ন ধরনের আত্মা অবস্থিত বলে পৃথকরূপে দর্শন হয়, সেই জ্ঞানকে রাজসিক বলে জানবে।
যত্তু কৃৎস্নবদেকস্মিন কার্যে সক্তমহৈতুকম্।
অতত্ত্বার্থবদল্পং চ তত্তামসমুদাহৃতম্।।২২।।
अनुवाद: “परंतु जिस ज्ञान से सभी प्राणियों में अलग-अलग प्रकार के अनेक भावों (भिन्नताओं) को भिन्न-भिन्न रूप में ही जाना जाता है, उस ज्ञान को तुम राजस जानो।”
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते।।२३।।
अनुवाद: “जो कर्म नियत (निश्चित) हो, जिसे आसक्ति रहित होकर, बिना राग-द्वेष के और फल की इच्छा के बिना किया जाता है, वह सात्त्विक कर्म कहलाता है।”
यत्तू कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्।।২৪।।
अनुवाद: “लेकिन जो कर्म अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए या अहंकार के साथ, बहुत परिश्रम से किया जाता है, वह राजसिक कहलाता है।”
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम्।
मोहादारभ्यते कर्मयत्तत्तामसमुच्यते।।२५।।
अनुवाद: “जो कर्म अपने परिणामों, हानि, हिंसा और अपने सामर्थ्य का विचार किए बिना केवल मोहवश शुरू किया जाता है, वह तामसिक कहलाता है।”
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते।।२६।।
अनुवाद: “जो कर्ता आसक्ति से मुक्त है, अहंकार रहित है, धैर्य और उत्साह से भरा है, और सिद्धि (सफलता) और असिद्धि (असफलता) में अविचलित रहता है, वह सात्त्विक कहलाता है।”
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः।।२७।।
अनुवाद: “जो कर्ता आसक्त, कर्मफल की कामना रखने वाला, लोभी, हिंसात्मक, अपवित्र और हर्ष-शोक में लिप्त रहता है, वह राजसिक कहलाता है।”
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैकृतिकोऽलसः।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते।।२८।।
अनुवाद: “जो कर्ता अयुक्त (अस्थिर), प्राकृत (अशिष्ट), स्तब्ध (हठी), शठ (कपटी), नैकृतिक (दूसरों का अपमान करने वाला), आलसी, दुखी और काम को टालने वाला हो, वह तामस कहलाता है।”
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय।।२९।।
अनुवाद: “हे धनंजय! अब तुम गुण के अनुसार बुद्धि और धैर्य के भी तीन प्रकार के भेदों को मुझसे विस्तार से और अलग-अलग सुनो।”
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी।।३०।।
अनुवाद: “हे पार्थ! जो बुद्धि प्रवृत्ति (कार्य करने की प्रेरणा) और निवृत्ति (कार्य से विरक्ति), कर्तव्य और अकर्तव्य, भय और अभय, तथा बंधन और मोक्ष को ठीक से जानती है, वह बुद्धि सात्त्विक है।”
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी।।३१।।
अनुवाद: “हे पार्थ! जिस बुद्धि के द्वारा मनुष्य धर्म और अधर्म तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को यथार्थ रूप में नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है।”
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।
सर्वार्थान् विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी।।३२।।
अनुवाद: “हे पार्थ! जो बुद्धि तमोगुण से ढकी हुई है और अधर्म को धर्म मानती है, तथा सभी बातों को विपरीत (उल्टा) समझती है, वह बुद्धि तामसी है।”
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी।।३३।।
अनुवाद: “हे पार्थ! जिस अविचलित धैर्य से मनुष्य मन, प्राण और इंद्रियों की क्रियाओं को योग के द्वारा धारण करता है, वह धैर्य सात्त्विक है।”
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी।।३५।।
अनुवाद: “हे पार्थ! जिस धैर्य से मंद बुद्धि वाला व्यक्ति नींद, भय, शोक, विषाद और मद (घमंड) को नहीं छोड़ पाता, वह धैर्य तामसिक है।”
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी।।३५।।
अनुवाद: “हे पार्थ! जिस धैर्य से मंद बुद्धि वाला व्यक्ति नींद, भय, शोक, विषाद और मद (घमंड) को नहीं छोड़ पाता, वह धैर्य तामसिक है।”
सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ।
अभ्यासाद् रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति।।३६।।
अनुवाद: “हे भरतश्रेष्ठ! अब मुझसे तीन प्रकार के सुख के बारे में सुनो, जिस सुख में व्यक्ति अभ्यास से रमण करता है और जिससे वह दुःखों का अंत प्राप्त करता है।”
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्।।३७।।
अनुवाद: “जो सुख पहले विष के समान प्रतीत होता है, लेकिन परिणाम में अमृत के समान होता है, और जो आत्मज्ञान तथा मन की प्रसन्नता से उत्पन्न होता है, वह सात्त्विक सुख कहलाता है।”
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्।।३८।।
अनुवाद: “जो सुख विषयों और इंद्रियों के संयोग से उत्पन्न होता है, जो पहले अमृत के समान प्रतीत होता है, लेकिन परिणाम में विष के समान होता है, वह सुख राजसिक कहा गया है।”
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्।।३९।।
अनुवाद: “जो सुख आरंभ में और अंत में भी आत्मा को मोहित करने वाला है, और जो नींद, आलस्य तथा प्रमाद (लापरवाही) से उत्पन्न होता है, वह सुख तामसिक कहा गया है।”
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात् त्रिभिर्गुणैः।।४०।।
अनुवाद: “पृथ्वी पर या स्वर्ग में देवताओं में भी ऐसा कोई प्राणी नहीं है, जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) से मुक्त हो।”
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः।।४१।।
अनुवाद: “हे परंतप! ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न होने वाले गुणों के द्वारा विभाजित हैं।”
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्।।४२।।
अनुवाद: “शम (मन का संयम), दम (इंद्रियों का संयम), तपस्या, शुचिता (पवित्रता), क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता (ईश्वर में विश्वास) — ये सब ब्राह्मण के स्वभाव से उत्पन्न होने वाले कर्म हैं।”
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्।।४३।।
अनुवाद: “शौर्य, तेज, धैर्य, दक्षता, युद्ध से न भागना, दानशीलता और ईश्वर जैसा भाव (नेतृत्व) — ये सब क्षत्रिय के स्वभाव से उत्पन्न होने वाले कर्म हैं।”
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्।।४४।।
अनुवाद: “कृषि (खेती), गो-रक्षा (गायों की रक्षा), और वाणिज्य (व्यापार) – ये वैश्य के स्वभाव से उत्पन्न होने वाले कर्म हैं। और सेवा करना शूद्र का भी स्वभाव से उत्पन्न होने वाला कर्म है।”
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु।।४५।।
अनुवाद: “अपने-अपने कर्मों में लगा हुआ मनुष्य सिद्धि (पूर्णता) प्राप्त करता है। जिस प्रकार अपने कर्म में लगा हुआ व्यक्ति सिद्धि को प्राप्त करता है, वह मुझसे सुनो।”
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः।।४६।।
अनुवाद: “जिससे समस्त प्राणियों की प्रवृत्ति (उत्पत्ति) हुई है, और जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, उस ईश्वर की मनुष्य अपने स्वाभाविक कर्म के द्वारा पूजा करके सिद्धि (परम-सिद्धि) को प्राप्त करता है।”
श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात्।
स्वभाव नियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।४७।।
अनुवाद: “अच्छी तरह से किए गए दूसरे के धर्म (कर्तव्य) से, गुणों से रहित (कमियों वाला) अपना धर्म श्रेष्ठ है। क्योंकि, अपने स्वभाव से निर्धारित कर्म करने वाला व्यक्ति पाप का भागी नहीं बनता।”
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः।।४८।।
अनुवाद: “हे कुंतीपुत्र! अपने स्वभाव से उत्पन्न होने वाले कर्म को, भले ही वह दोषपूर्ण हो, नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि सभी कर्म, जैसे आग धुआँ से ढकी हुई होती है, वैसे ही दोष से ढके होते हैं।”
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति।।४९।।
अनुवाद: “जिसकी बुद्धि हर जगह अनासक्त है, जिसने अपनी आत्मा (मन) को जीत लिया है, और जो सभी इच्छाओं से मुक्त हो गया है, वह संन्यास के द्वारा परम नैष्कर्म्यसिद्धि को प्राप्त होता है।”
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे।
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा।।५०।।
अनुवाद: “हे कुंतीपुत्र! सिद्धि को प्राप्त हुआ पुरुष जिस प्रकार से ब्रह्म को प्राप्त होता है, उस ज्ञानयोग की परम निष्ठा को तुम संक्षेप में मुझसे सुनो।”
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च।
शब्दादीन् विषयाRस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च।।५১।।
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः।।५२।।
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते।।५३।।
अनुवाद: शुद्ध बुद्धि से युक्त होकर, धैर्य द्वारा मन को नियंत्रित करके, शब्द आदि इंद्रियों के विषयों को त्यागकर, राग और द्वेष का त्याग करके, एकांत स्थान में वास करके, थोड़ा भोजन करके, शरीर, मन और वाणी को संयमित करके, निरंतर ध्यानयोग में संलग्न होकर, वैराग्य का आश्रय लेकर, अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और संग्रह-प्रवृत्ति से पूर्णतया मुक्त होकर, ममता-रहित और शांत पुरुष ब्रह्म का अनुभव करने में समर्थ होता है।
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्।।५४।।
अनुवाद: “जो ब्रह्म-स्वरूप हो गया, जिसकी आत्मा प्रसन्न है, वह न तो शोक करता है और न ही कुछ चाहता है। वह सभी प्राणियों में समान होकर मेरी परा भक्ति को प्राप्त करता है।”
भक्त्या मामभिजानाति यावान् यश्चास्मि तत्त्वतः।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनंतरम्।।५५।।
अनुवाद: “भक्ति के द्वारा ही वह मुझे तत्त्व से जान पाता है कि मैं कौन और कैसा हूँ। इस प्रकार मुझे तत्त्व से जानकर वह तुरंत मुझ में प्रवेश कर जाता है।”
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्।।५६।।
अनुवाद: “सभी कर्मों को सदा करते हुए भी, जो मुझ पर आश्रित रहता है, वह मेरी कृपा से उस शाश्वत (नित्य) और अव्यय (अविनाशी) पद को प्राप्त करता है।”
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव।।५७।।
अनुवाद: “मन से सभी कर्मों को मुझमें समर्पित करके, मुझे ही परम लक्ष्य मानकर, बुद्धि योग का आश्रय लेकर, निरंतर मुझमें चित्त (मन) को लगाओ।”
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि।।५८।।
अनुवाद: “मुझमें चित्त लगाने से तुम मेरी कृपा से सभी कठिनाइयों को पार कर जाओगे। लेकिन यदि अहंकार के कारण तुम मेरी बात नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट हो जाओगे।”
यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति।।५९।।
अनुवाद: “यदि तुम अहंकार के कारण सोचते हो कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, तो तुम्हारा यह संकल्प झूठा है। क्योंकि तुम्हारी प्रकृति (स्वभाव) तुम्हें युद्ध करने के लिए विवश कर देगी।”
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात् करिष्यस्यवशोहपि तत्।।६०।।
अनुवाद: “हे कुंतीपुत्र! तुम अपने स्वभाव से उत्पन्न कर्म से बँधे हुए हो। इसलिए, जिस कार्य को तुम मोह के कारण करना नहीं चाहते हो, उसे भी तुम विवश होकर करोगे।”
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।।६१।।
अनुवाद: “हे अर्जुन! ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में निवास करते हैं और यंत्र पर आरूढ़ (बैठे हुए) सभी प्राणियों को अपनी माया से घुमाते रहते हैं।”
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात् परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।।६२।।
अनुवाद: “हे भारत! तू सब प्रकार से उसी (परमेश्वर) की शरण में जा। उसकी कृपा से तू परम शांति और शाश्वत (नित्य) स्थान को प्राप्त करेगा।”
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु।।६३।।
अनुवाद: “इस प्रकार मैंने तुम्हें गोपनीय से भी अति गोपनीय ज्ञान बताया। अब इस पर पूरी तरह से विचार करके, जैसा तुम चाहो वैसा करो।”
सर्वगुह्यतमं भूयः श्रृणु मे परमं वचः।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्।।६४।।
अनुवाद: “सभी गोपनीय ज्ञानों में सबसे गोपनीय मेरे परम वचन को फिर से सुनो। चूंकि तुम मुझे बहुत प्रिय हो, इसलिए मैं तुम्हारे हित के लिए यह कह रहा हूँ।”
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे।।६५।।
अनुवाद: “मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो और मुझे प्रणाम करो। तुम मुझे ही प्राप्त होगे; मैं तुमसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तुम मुझे अत्यंत प्रिय हो।”
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।६६।।
अनुवाद: “सभी धर्मों (कर्तव्यों) को छोड़कर तुम केवल मेरी शरण में आओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो।”
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति।।৬৭।।
अनुवाद: “यह ज्ञान तुम्हें कभी भी ऐसे व्यक्ति को नहीं देना चाहिए जो तपस्याहीन है, जो भक्त नहीं है, जो सुनने का इच्छुक नहीं है और जो मेरी निंदा करता है।”
य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः।।६८।।
अनुवाद: “जो मेरे भक्तों में इस परम गोपनीय ज्ञान का उपदेश देगा, वह मुझमें परा भक्ति स्थापित करके निस्संदेह मुझे ही प्राप्त होगा।”
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि।।६९।।
अनुवाद: “मनुष्यों में उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला कोई नहीं है। और इस पृथ्वी पर उससे बढ़कर मेरा प्रिय दूसरा कोई हुआ है, न होगा।”
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः।।৭০।।
अनुवाद: “जो व्यक्ति हम दोनों के इस धर्ममय संवाद का अध्ययन करेगा, उस ज्ञानयज्ञ के द्वारा मैं उसके द्वारा पूजित होऊँगा—यह मेरा मत है।”
श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान् प्राप्नुयात् पुण्यकर्मणाम्।।७१।।
अनुवाद: “जो व्यक्ति श्रद्धावान और निंदा रहित होकर इस उपदेश को केवल सुनता भी है, वह भी पापों से मुक्त होकर पुण्यवानों के शुभ लोकों को प्राप्त करता है।”
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा।
कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रणष्टस्ते धनंजय।।७२।।
अनुवाद: “हे पार्थ! क्या तुमने यह एकाग्र मन से सुना? हे धनंजय! क्या तुम्हारा अज्ञान से उत्पन्न मोह नष्ट हो गया?”
अर्जुन उवाच
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव।।७३।।
अनुवाद: “अर्जुन ने कहा: हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे अपनी स्मृति (कर्तव्य का ज्ञान) वापस मिल गई है। अब मैं स्थिर और संदेह रहित होकर आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।”
संजय उवाच
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः।
संवादमिममश्रौषम् अद्भुतं रोमहर्षणम्।।७४।।
अनुवाद: “संजय ने कहा: इस प्रकार मैंने वासुदेव और महात्मा पार्थ के इस अद्भुत और रोमांचकारी संवाद को सुना।”
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद् गुह्यमहं परम्।
योगं योगेश्वरात् कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्।।७५।।
अनुवाद: “व्यास की कृपा से मैंने इस परम और गोपनीय योग को, स्वयं योगेश्वर कृष्ण से सीधे सुनते हुए श्रवण किया।”
राजन् संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्।
केशवार्जुुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः।।७६।।
अनुवाद: “हे राजन्! केशव और अर्जुन के इस अद्भुत और पवित्र संवाद को बार-बार याद करके मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ।”
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः।
विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः।।७७।।
अनुवाद: “हे राजन्! हरि के उस अति अद्भुत रूप को बार-बार याद करके, मेरे मन में एक महान विस्मय उत्पन्न हो रहा है और मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ।”
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।।७८।।
अनुवाद: “जहाँ योगेश्वर कृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धारी अर्जुन हैं, वहीं पर श्री (समृद्धि), विजय, विभूति (ऐश्वर्य) और अटल नीति (न्याय) है—यह मेरा मत है।”
