श्री व्यासदेव द्वारा रचित श्रीमद्भगवद्गीता-माहात्म्य
गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः।
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद् विनिःसृता।।
अनुवाद: “गीता का अच्छी प्रकार से गायन (अध्ययन) करना चाहिए, फिर अन्य विस्तृत शास्त्रों की क्या आवश्यकता है? क्योंकि यह (गीता) तो स्वयं भगवान पद्मनाभ (विष्णु/कृष्ण) के मुख कमल से निकली है।”
सर्वशास्त्रमयी गीता सर्वदेवमयी यतः।
सर्वधर्ममयी यस्मात्तस्मादेतां समभ्यसेत्।।
अनुवाद: “क्योंकि गीता सभी शास्त्रों से युक्त है, सभी देवताओं से युक्त है, और सभी धर्मों से युक्त है, इसलिए इसका अभ्यास (अध्ययन) करना चाहिए।”
শালগ্রামশিলাগ্রে তু গীতাধ্যায়ং পঠেত্তু যঃ ৷
মন্বন্তরসহস্রাণি বসতে ব্রহ্মণঃ পুরে ॥৩॥
अनुवाद: “जो मनुष्य शालीग्राम शिला के सम्मुख (सामने) बैठकर गीता के अध्याय का पाठ करता है, वह हज़ारों मन्वन्तरों तक ब्रह्मा के लोक में निवास करता है।”
हत्वा हत्वा जगत् सर्वं मुषित्वा स चराचरम्।
पापैर्न लिप्यते चैव गीताध्यायी कथञ्चन।।४।।
तेनेष्टं क्रतुभिः सर्वैर्दत्तं तेन गवायुतम्।
गीतामभ्यस्यता नित्यं तेनाप्तं पदमव्ययम्।।५।।
अनुवाद: “जो मनुष्य गीता का अध्ययन करने वाला (गीताध्यायी) है, वह संपूर्ण जगत को मारकर और चर-अचर (चलने वाले और स्थिर) सभी वस्तुओं को चुराकर भी किसी भी तरह से पापों से लिप्त नहीं होता है। उसने ही सभी यज्ञों का अनुष्ठान कर लिया, और उसने ही दस हजार गायों का दान कर दिया।”
गीताध्यायम् पठेद् यस्तु श्लोकं श्लोकार्धमेव वा।
भवपाप विनिर्मुक्तो याति विष्णोः परं पदम्।।
अनुवाद: “जो मनुष्य गीता के अध्याय को, या एक श्लोक को, या श्लोक के आधे भाग को भी पढ़ता है, वह संसार के पापों (भव-पाप) से पूरी तरह मुक्त होकर भगवान विष्णु के परम धाम को प्राप्त करता है।”
यो नित्यं विश्वरूपाख्यमध्य़ायं पठति द्विजः।
विभूतिं देवदेवस्य तस्य पुण्यं वदाम्यहम्।। ॥७॥
वेदैरधीतैर् यत् पुण्यं सेतिहासैः पुरातनैः।
श्लोकेनैकেন तत् पुण्यं लभते नात्र संशयः।। ॥८॥
आब्रह्मस्तम्भपर्यन्तं जगत् तृप्तिं करोति सः।
विश्वरूपं सदैवाध्यायम् विभूतिं च पठेत् तु यः ॥९॥
अनुवाद: “जो द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य—यहाँ श्रद्धालु पाठक का प्रतीक) नित्य (प्रतिदिन) विश्वरूप नाम वाले अध्याय को पढ़ता है और देवों के देव (श्रीकृष्ण) की विभूति (ऐश्वर्य) का स्मरण करता है, मैं उसके पुण्य (फल) का वर्णन करता हूँ।”
“जो पुण्य वेदों के अध्ययन से और प्राचीन इतिहासों (पुराणों, आदि) के अध्ययन से प्राप्त होता है, वह पुण्य (विश्वरूप अध्याय के) एक श्लोक मात्र से प्राप्त हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं है।”
“जो मनुष्य सदैव (नित्य) विश्वरूप अध्याय और विभूति (ऐश्वर्य) का पाठ करता है, वह ब्रह्मा से लेकर स्तंभ (छोटे से छोटे जीव) तक संपूर्ण जगत को संतुष्ट करता है।”
अहन्यहनि यो मर्त्यो गीताध्यायं पठेत् तु वै।
द्वात्रिंशदपराध़ांस्तु क्षमते तस्य केशवः।।१०।।
लिखित्वैव वैष्णवानां च गीताशास्त्रं प्रयच्छति।
दिने दिने च यजते हरिं चात्र न संशयः॥११॥
चतुर्णामेव वेदानां सारमुद्धृत्य विष्णुना।
त्रैलोक्यस्योपकाराय गीताशास्त्रं प्रकाशितम् ॥१२॥
अनुवाद: “जो मनुष्य प्रतिदिन (अहन्यहनि) गीता के अध्याय का पाठ करता है, केशव (श्रीकृष्ण) उसके बत्तीस (द्वात्रिंशत्) अपराधों को क्षमा कर देते हैं। और जो व्यक्ति गीता शास्त्र को लिखकर वैष्णवों को प्रदान करता है, वह नित्य प्रति हरि की पूजा करता है, इसमें कोई संदेह नहीं है।”
“विष्णु (भगवान) ने चारों वेदों के सार को निकालकर (उद्धृत्य), तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) के उपकार के लिए गीता शास्त्र को प्रकाशित किया है।”
भारतामृतसर्वस्वं विष्णोर्वक्त्राद् विनिःसृतम्।
गीता-गङ्गोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते।।१३।।
धर्मं चार्थं च कामं च मोक्षं चापीच्छता सदा।
श्रोतव्या पठनीया च गीता कृष्णमुखोद्गता ।।१४।।
अनुवाद: “जो महाभारत रूपी अमृत का सार है, जो भगवान विष्णु के श्रीमुख से निकला है, उस गीता रूपी गंगाजल को पीने (ग्रहण करने) वाले व्यक्ति का फिर से जन्म नहीं होता।”
“जो मनुष्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थों की सदा इच्छा रखता है, उसे कृष्ण के मुख से निकली हुई इस गीता को सुनना और पढ़ना चाहिए।”
यो नरः पठते नित्यं गीताशास्त्रं दिने दिने।
विमुक्तः सर्वपापेभ्यो याति विष्णोः परं पदम्।।
अनुवाद: “जो मनुष्य प्रतिदिन (दिने दिने) नियमित रूप से (नित्यम्) गीता शास्त्र का पाठ करता है, वह सभी पापों से पूर्णतः मुक्त होकर भगवान विष्णु के परम धाम को प्राप्त करता है।”
