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श्रीमद्भगवद्गीता

"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन मा कर्मफलहेतुर्भूमा ते संगोऽस्त्वकर्मणि"

श्रीमद्भगवद्गीता : गीता माहात्म्य || Shrimad Bhagavadgita : Gita Mahatmya

  • 22 min read

अनुवाद: “गीता का अच्छी प्रकार से गायन (अध्ययन) करना चाहिए, फिर अन्य विस्तृत शास्त्रों की क्या आवश्यकता है? क्योंकि यह (गीता) तो स्वयं भगवान पद्मनाभ (विष्णु/कृष्ण) के मुख कमल से निकली है।”

अनुवाद: “क्योंकि गीता सभी शास्त्रों से युक्त है, सभी देवताओं से युक्त है, और सभी धर्मों से युक्त है, इसलिए इसका अभ्यास (अध्ययन) करना चाहिए।”

अनुवाद: “जो मनुष्य गीता के अध्याय को, या एक श्लोक को, या श्लोक के आधे भाग को भी पढ़ता है, वह संसार के पापों (भव-पाप) से पूरी तरह मुक्त होकर भगवान विष्णु के परम धाम को प्राप्त करता है।”

अनुवाद: “जो द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य—यहाँ श्रद्धालु पाठक का प्रतीक) नित्य (प्रतिदिन) विश्वरूप नाम वाले अध्याय को पढ़ता है और देवों के देव (श्रीकृष्ण) की विभूति (ऐश्वर्य) का स्मरण करता है, मैं उसके पुण्य (फल) का वर्णन करता हूँ।”

“जो पुण्य वेदों के अध्ययन से और प्राचीन इतिहासों (पुराणों, आदि) के अध्ययन से प्राप्त होता है, वह पुण्य (विश्वरूप अध्याय के) एक श्लोक मात्र से प्राप्त हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं है।”

“जो मनुष्य सदैव (नित्य) विश्वरूप अध्याय और विभूति (ऐश्वर्य) का पाठ करता है, वह ब्रह्मा से लेकर स्तंभ (छोटे से छोटे जीव) तक संपूर्ण जगत को संतुष्ट करता है।”

अनुवाद: “जो मनुष्य प्रतिदिन (अहन्यहनि) गीता के अध्याय का पाठ करता है, केशव (श्रीकृष्ण) उसके बत्तीस (द्वात्रिंशत्) अपराधों को क्षमा कर देते हैं। और जो व्यक्ति गीता शास्त्र को लिखकर वैष्णवों को प्रदान करता है, वह नित्य प्रति हरि की पूजा करता है, इसमें कोई संदेह नहीं है।”

“विष्णु (भगवान) ने चारों वेदों के सार को निकालकर (उद्धृत्य), तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) के उपकार के लिए गीता शास्त्र को प्रकाशित किया है।”

अनुवाद: “जो महाभारत रूपी अमृत का सार है, जो भगवान विष्णु के श्रीमुख से निकला है, उस गीता रूपी गंगाजल को पीने (ग्रहण करने) वाले व्यक्ति का फिर से जन्म नहीं होता।”

“जो मनुष्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थों की सदा इच्छा रखता है, उसे कृष्ण के मुख से निकली हुई इस गीता को सुनना और पढ़ना चाहिए।”

अनुवाद: “जो मनुष्य प्रतिदिन (दिने दिने) नियमित रूप से (नित्यम्) गीता शास्त्र का पाठ करता है, वह सभी पापों से पूर्णतः मुक्त होकर भगवान विष्णु के परम धाम को प्राप्त करता है।”

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