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श्रीमद्भगवद्गीता

"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन मा कर्मफलहेतुर्भूमा ते संगोऽस्त्वकर्मणि"

तीसरा अध्याय : कर्मयोग || Karma Yoga

श्लोक : 0१

अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे जनार्दन! यदि आप कर्म की अपेक्षा ज्ञान को श्रेष्ठ मानते हैं, तो फिर मुझे इस घोर युद्ध रूपी कर्म में क्यों लगा रहे हैं, हे केशव?

श्लोक : 0

अनुवाद: आप इन मिले-जुले वचनों से मानो मेरी बुद्धि को भ्रमित कर रहे हैं। अतः आप निश्चित रूप से एक ही मार्ग बताइए, जिससे मैं परम कल्याण को प्राप्त करूँ।

श्लोक : 0

अनुवाद: श्रीभगवान ने कहा: हे निष्पाप (अर्जुन)! इस संसार में दो प्रकार की निष्ठाएँ मेरे द्वारा पहले कही गई हैं। ज्ञानियों के लिए ज्ञानयोग और योगियों के लिए कर्मयोग।

श्लोक : 0

अनुवाद: मनुष्य न तो कर्मों का आरंभ किए बिना निष्कामता (नैष्कर्म्य) को प्राप्त होता है और न ही केवल संन्यास ले लेने मात्र से सिद्धि को प्राप्त होता है।

श्लोक : 0

अनुवाद: निश्चय ही कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षण भर भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता। क्योंकि सभी प्राणी प्रकृति से उत्पन्न गुणों द्वारा विवश होकर कर्म करते हैं।

श्लोक : 0

अनुवाद: जो मनुष्य अपनी इंद्रियों को बाहरी रूप से रोककर, मन से उन विषयों का चिंतन करता रहता है, वह मूढ़ बुद्धि वाला व्यक्ति झूठा आचरण करने वाला (मिथ्याचारी) कहलाता है।

श्लोक : 0

अनुवाद: परंतु, हे अर्जुन! जो मनुष्य मन द्वारा इंद्रियों को वश में करके, बिना आसक्ति के कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वह श्रेष्ठ है।

श्लोक : 0

अनुवाद: तू शास्त्रविहित अपना कर्तव्य कर्म कर। क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है। कर्म के बिना तो तेरा शरीर निर्वाह भी सिद्ध नहीं हो सकता।

श्लोक : 0

अनुवाद: यज्ञ के लिए किए गए कर्मों के अतिरिक्त अन्य कर्मों में लगा हुआ यह मनुष्य समुदाय कर्मों के बंधन में फँसता है। अतः हे कुंतीपुत्र! तू आसक्ति से रहित होकर उस यज्ञ के निमित्त ही कर्म कर।

श्लोक : १०

अनुवाद: प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आरंभ में यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर उनसे कहा कि तुम इस यज्ञ के द्वारा वृद्धि को प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुम लोगों की समस्त इच्छित कामनाओं को पूर्ण करने वाला हो।

श्लोक : ११

अनुवाद: तुम लोग इस यज्ञ के द्वारा देवताओं को उन्नत करो और वे देवता तुम लोगों को उन्नत करें। इस प्रकार एक-दूसरे को उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त होगे।

श्लोक : १२

अनुवाद: क्योंकि यज्ञ द्वारा पाले हुए देवता तुम लोगों को बिना माँगे ही इच्छित भोग देते रहेंगे। इस प्रकार उन देवताओं द्वारा दिए हुए भोगों को जो उनको अर्पित किए बिना ही स्वयं भोगता है, वह चोर ही है।

श्लोक : १३

अनुवाद: यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं। परंतु जो पापी लोग केवल अपने लिए ही भोजन पकाते हैं, वे तो पाप को ही खाते हैं।

श्लोक : १४

अनुवाद: सभी प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं। अन्न की उत्पत्ति वर्षा से होती है। वर्षा यज्ञ से होती है और यज्ञ विहित कर्मों से उत्पन्न होने वाला है।

श्लोक : १५

अनुवाद: कर्म को तू ब्रह्म से उत्पन्न हुआ जान और ब्रह्म को अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ जान। इसलिए सर्वव्यापी परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है।

श्लोक : १६

अनुवाद: हे पार्थ! जो मनुष्य इस प्रकार चलाए गए सृष्टिचक्र के अनुसार नहीं चलता, वह इंद्रियों द्वारा सुख भोगने वाला पापी व्यक्ति व्यर्थ ही जीता है।

श्लोक : १७

अनुवाद: परंतु जो मनुष्य केवल आत्मा में ही रमण करने वाला हो, आत्मा में ही संतुष्ट हो और आत्मा में ही आनंद मानता हो, उसके लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता।

श्लोक : १८

अनुवाद: उस महापुरुष का इस विश्व में कर्म करने से कोई प्रयोजन नहीं रहता और न कर्म न करने से कोई हानि होती है। तथा संपूर्ण प्राणियों में भी उसका किसी के साथ कोई स्वार्थ का संबंध नहीं होता।

श्लोक : १९

अनुवाद: इसलिए, तू निरंतर आसक्ति रहित होकर कर्तव्य कर्म कर। क्योंकि आसक्ति रहित होकर कर्म करने से मनुष्य को परमपद की प्राप्ति होती है।

श्लोक : २०

अनुवाद: जनकादि ज्ञानीजन भी कर्मों द्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे। इसलिए तुझे भी लोकसंग्रह (संसार की भलाई) को देखते हुए कर्म करना चाहिए।

श्लोक : २१

अनुवाद: श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, दूसरे सामान्य लोग भी वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ भी प्रमाण कर देता है, लोग उसी का अनुसरण करते हैं।

श्लोक : २२

अनुवाद: हे पार्थ! मेरे लिए तीनों लोकों में कुछ भी कर्तव्य नहीं है, और न ही कोई अप्राप्त वस्तु है जिसे मुझे प्राप्त करना हो, फिर भी मैं कर्म में लगा रहता हूँ।

श्लोक : २३

अनुवाद: क्योंकि, हे पार्थ! यदि मैं सावधानीपूर्वक कर्म न करूँ, तो सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करने लगेंगे।

श्लोक : २४

अनुवाद: यदि मैं कर्म न करूँ, तो ये सब लोक नष्ट हो जाएँगे, और मैं वर्णसंकर का कर्ता बनूँगा तथा इन प्रजाओं को नष्ट करने वाला बनूँगा।

श्लोक : २५

अनुवाद: हे भारत! जिस प्रकार अज्ञानी लोग आसक्ति से कर्म करते हैं, उसी प्रकार ज्ञानी को भी आसक्ति रहित होकर लोकसंग्रह (संसार की भलाई) की इच्छा से कर्म करना चाहिए।

श्लोक : २६

अनुवाद: ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह कर्म में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम उत्पन्न न करे, बल्कि स्वयं शास्त्रविहित कर्मों को अच्छी तरह से करते हुए उनसे भी वैसे ही कर्म करवाए।

श्लोक : २७

अनुवाद: वास्तव में सभी कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा ही किए जाते हैं, फिर भी अहंकार से मोहित हुआ व्यक्ति ‘मैं कर्ता हूँ’ ऐसा मानता है।

श्लोक : २८

अनुवाद: परंतु हे महाबाहो! गुण और कर्म के विभाग के तत्त्व को जानने वाला ज्ञानी यह समझता है कि ‘इंद्रियाँ ही अपने-अपने विषयों में बरत रही हैं’, और इसलिए वह उनमें आसक्त नहीं होता।

श्लोक : २९

अनुवाद: प्रकृति के गुणों से पूरी तरह से मोहित हुए अज्ञानी लोग गुणों और कर्मों में आसक्त रहते हैं। उन अज्ञानी मंदबुद्धि वालों को पूर्ण ज्ञानी विचलित न करे।

श्लोक : ३०

अनुवाद: अपने मन को अध्यात्म में लगाकर, सभी कर्मों को मुझमें समर्पित करके, आशा और ममत्व से रहित होकर तथा शोक से मुक्त होकर तू युद्ध कर।

श्लोक : ३१

अनुवाद: जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक और बिना ईर्ष्या किए मेरे इस मत (उपदेश) का पालन करते हैं, वे भी सभी कर्मों के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक : ३२

अनुवाद: परंतु जो लोग मेरे इस मत से ईर्ष्या करते हैं और इसका पालन नहीं करते, उन सभी ज्ञान से विमूढ़ और विवेकहीन लोगों को तू नष्ट हुए ही समझ।

श्लोक : ३३

अनुवाद: सभी प्राणी अपनी प्रकृति (स्वभाव) के अनुसार ही आचरण करते हैं, भले ही वे ज्ञानी क्यों न हों। सभी प्राणी अपनी प्रकृति का ही अनुसरण करते हैं, तो दमन क्या करेगा?

श्लोक : ३४

अनुवाद: प्रत्येक इंद्रिय का अपने-अपने विषय में राग और द्वेष स्थित है। मनुष्य को उन दोनों के वश में नहीं होना चाहिए, क्योंकि ये दोनों ही उसके शत्रु हैं।

श्लोक : ३५

अनुवाद: अच्छी प्रकार से आचरण किए गए परधर्म की अपेक्षा गुणों से रहित होने पर भी अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्म में मरना कल्याणकारी है, परधर्म तो भय उत्पन्न करने वाला है।

श्लोक : ३६

अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे वृष्णिवंशी (कृष्ण)! फिर यह मनुष्य स्वयं न चाहते हुए भी, किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है? मानो किसी के द्वारा बलपूर्वक लगाया गया हो।

श्लोक : ३७

अनुवाद: श्रीभगवान ने कहा: यह कामना ही क्रोध है, जो रजोगुण से उत्पन्न होता है। यह बड़ा खाने वाला और महापापी है। तू इस कामना को ही यहाँ शत्रु जान।

श्लोक : ३८

अनुवाद: जिस प्रकार धुएँ से अग्नि, मैल से दर्पण और जेर से गर्भ ढँका रहता है, उसी प्रकार इस कामना से ज्ञान ढँका रहता है।

श्लोक : ३९

अनुवाद: हे कुंतीपुत्र! ज्ञानियों के इस नित्य शत्रु, कामना रूपी अग्नि से ज्ञान ढँका हुआ है, जो कभी तृप्त नहीं होता।

श्लोक : ४०

अनुवाद: इंद्रियाँ, मन और बुद्धि – ये इस कामना के आश्रयस्थल कहे जाते हैं। यह कामना इन इंद्रियों और मन-बुद्धि के द्वारा ज्ञान को ढँककर जीवात्मा को मोहित कर देती है।

श्लोक : ४१

अनुवाद: इसलिए, हे भरतश्रेष्ठ! तू पहले इंद्रियों को वश में करके इस पापी (कामना) को मार डाल, जो ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाला है।

श्लोक : ४२

अनुवाद: इंद्रियों को शरीर से श्रेष्ठ कहा गया है। इंद्रियों से मन श्रेष्ठ है। मन से बुद्धि श्रेष्ठ है और जो बुद्धि से भी श्रेष्ठ है, वह आत्मा है।

श्लोक :

अनुवाद: इस प्रकार बुद्धि से आत्मा को श्रेष्ठ जानकर, हे महाबाहो (अर्जुन)! तू अपने-आप से अपने-आपको स्थिर करके इस दुष्ट कामना रूपी शत्रु को मार डाल।

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