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श्रीमद्भगवद्गीता

"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन मा कर्मफलहेतुर्भूमा ते संगोऽस्त्वकर्मणि"

दसवाँ अध्याय : विभूति-योग || Vibhuti Yoga

श्लोक : 0१

श्रीभगवान ने कहा: हे महाबाहो (अर्जुन)! मेरे परम वचन को फिर से सुनो, जिसे मैं तुम्हारे हित की इच्छा से तुम्हें कहूँगा, क्योंकि तुम मुझसे बहुत प्रेम करते हो।

श्लोक : 0

न तो देवता और न ही महर्षिगण मेरे प्रभाव को जानते हैं, क्योंकि मैं देवताओं और महर्षियों सबका आदि (मूल कारण) हूँ।

श्लोक : 0

जो मुझे अजन्मा, अनादि और संपूर्ण लोकों का महान ईश्वर जानता है, वह मनुष्यों में मोह रहित होकर सभी पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक : 0-0

बुद्धि, ज्ञान, मोह से रहित होना, क्षमा, सत्य, इंद्रियों पर नियंत्रण, मन पर नियंत्रण, सुख, दुःख, उत्पत्ति, विनाश, भय और अभय, अहिंसा, समता, संतोष, तपस्या, दान, यश और अपयश – ये सभी प्राणियों के विभिन्न भाव मुझसे ही उत्पन्न होते हैं।

श्लोक : 0

सात महान ऋषि, उनसे पहले चार सनकादि और चौदह मनु, ये सब मेरे भाव से मेरे मानसिक संकल्प से उत्पन्न हुए हैं, जिनकी यह सारी प्रजा है।

श्लोक : 0

जो मनुष्य मेरे इस ऐश्वर्य (विभूति) और योग को तत्त्व से जानता है, वह अचल भक्ति योग से युक्त होता है, इसमें कोई संदेह नहीं है।

श्लोक : 0

मैं सभी संसार का कारण हूँ और सब कुछ मुझसे ही उत्पन्न होता है। इस प्रकार जानकर ज्ञानीजन भावपूर्वक मेरा भजन करते हैं।

श्लोक : 0

मुझमें चित्त वाले, मुझमें ही प्राणों को लगाने वाले भक्त आपस में एक-दूसरे को मेरा ज्ञान देते हुए और हमेशा मेरा ही गुणगान करते हुए संतुष्ट होते हैं और रमण करते हैं।

श्लोक : १०

उन नित्य मुझमें लगे हुए और प्रेमपूर्वक मेरा भजन करने वालों को मैं वह बुद्धियोग (आत्मज्ञान) देता हूँ, जिससे वे मुझे प्राप्त करते हैं।

श्लोक : ११

उनके ऊपर अनुग्रह करने के लिए मैं उनके हृदय में स्थित होकर अज्ञान से उत्पन्न हुए अंधकार को ज्ञान रूपी दीप्तिमान दीपक से नष्ट कर देता हूँ।

श्लोक : १२-१३

अर्जुन ने कहा: आप परम ब्रह्म, परम धाम और परम पवित्र हैं। सभी ऋषि, देवर्षि नारद, असित, देवल और व्यास भी आपको सनातन, दिव्य पुरुष, आदि देव, अजन्मा और सर्वव्यापी कहते हैं, और आप स्वयं भी मुझसे ऐसा ही कह रहे हैं।

श्लोक : १४

हे केशव! आप मुझसे जो कह रहे हैं, मैं यह सब सत्य मानता हूँ। हे भगवान! न तो देवता और न ही दानव आपकी महिमा को जानते हैं।

श्लोक : १५

हे पुरुषोत्तम! हे भूतों को उत्पन्न करने वाले! हे भूतों के स्वामी! हे देवों के देव! हे जगत् के स्वामी! आप स्वयं ही अपनी आत्मा से अपनी आत्मा को जानते हैं।

श्लोक : १६

आपको ही अपनी दिव्य विभूतियों को पूरी तरह से कहने के योग्य हैं, जिन विभूतियों से आप इन सभी लोकों को व्याप्त करके स्थित हैं।

श्लोक : १७

हे योगी! मैं आपका हमेशा चिंतन करते हुए आपको कैसे जानूँ? हे भगवान! आप किन-किन भावों में मेरे द्वारा चिंतन करने योग्य हैं?

श्लोक : १८

हे जनार्दन! आप अपने योग और विभूति को विस्तार से फिर से कहिए, क्योंकि आपके अमृतमय वचनों को सुनकर मेरी तृप्ति नहीं होती।

श्लोक : १९

श्रीभगवान ने कहा: हे कुरुश्रेष्ठ! अब मैं तुझे अपनी दिव्य विभूतियों को प्रमुख रूप से कहूँगा, क्योंकि मेरे विस्तार का कोई अंत नहीं है।

श्लोक : २०

हे गुडाकेश (अर्जुन)! मैं सभी प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ। मैं ही सभी प्राणियों का आदि (उत्पत्ति), मध्य (स्थिति) और अंत (संहार) हूँ।

श्लोक : २१

मैं आदित्यों में विष्णु हूँ, ज्योतियों में प्रकाशमान सूर्य हूँ, मरुतों (वायु के देवता) में मरीचि हूँ, और नक्षत्रों में चंद्रमा हूँ।

श्लोक : २२

मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवताओं में इंद्र हूँ, इंद्रियों में मन हूँ, और प्राणियों में चेतना हूँ।

श्लोक : २३

मैं रुद्रों में शंकर हूँ, यक्षों और राक्षसों में कुबेर हूँ, वसुओं में अग्नि हूँ, और शिखरों (पर्वतों) में मेरु हूँ।

श्लोक : २४

हे पार्थ! पुरोहितों में मुझको बृहस्पति जान। मैं सेनानियों में स्कन्द (कार्तिकेय) हूँ, और जलाशयों में सागर हूँ।

श्लोक : २५

मैं महर्षियों में भृगु हूँ, वाणी में एकाक्षर (ॐकार) हूँ, यज्ञों में जपयज्ञ हूँ, और अचल वस्तुओं (पर्वतों) में हिमालय हूँ।

श्लोक : २६

मैं सभी वृक्षों में पीपल हूँ, देवर्षियों में नारद हूँ, गंधर्वों में चित्ररथ हूँ, और सिद्धों में कपिल मुनि हूँ।

श्लोक : २७

घोड़ों में मुझको अमृत से उत्पन्न उच्चैःश्रवा जान। श्रेष्ठ हाथियों में ऐरावत हूँ, और मनुष्यों में राजा हूँ।

श्लोक : २८

मैं हथियारों में वज्र हूँ, गायों में कामधेनु हूँ, संतान उत्पत्ति के कारण कामदेव हूँ, और साँपों में वासुकि हूँ।

श्लोक : २९

मैं नागों में अनंत हूँ, जल के देवताओं में वरुण हूँ, पितरों में अर्यमा हूँ, और शासन करने वालों में यम हूँ।

श्लोक : ३०

मैं दैत्यों में प्रह्लाद हूँ, गणना करने वालों में काल हूँ, मृगों में सिंह हूँ, और पक्षियों में गरुड़ हूँ।

श्लोक : ३१

मैं पवित्र करने वालों में वायु हूँ, शस्त्रधारियों में राम हूँ, मछलियों में मगर हूँ, और नदियों में गंगा हूँ।

श्लोक : ३२

हे अर्जुन! मैं सृष्टियों का आदि, अंत और मध्य भी हूँ। विद्याओं में अध्यात्म विद्या हूँ और वाद-विवाद करने वालों में सही तर्क हूँ।

श्लोक : ३३

मैं अक्षरों में ‘अकार’ हूँ, समासों में द्वंद्व समास हूँ। मैं ही अक्षय काल हूँ और मैं ही सभी दिशाओं में मुख वाला धारण करने वाला हूँ।

श्लोक : ३४

मैं सब कुछ हरने वाली मृत्यु हूँ, और भविष्य में उत्पन्न होने वालों का कारण भी हूँ। स्त्रियों में कीर्ति, श्री (सौंदर्य), वाणी, स्मृति, मेधा (बुद्धि), धैर्य और क्षमा हूँ।

श्लोक : ३५

मैं सामों (सामवेद के मंत्रों) में बृहत्साम हूँ, छंदों में गायत्री हूँ, महीनों में मार्गशीर्ष हूँ, और ऋतुओं में वसंत हूँ।

श्लोक : ३६

मैं छल करने वालों में जुआ हूँ, तेजस्वियों का तेज हूँ। मैं विजय हूँ, निश्चय हूँ, और सत्त्वगुण वालों का सत्त्व हूँ।

श्लोक : ३७

मैं वृष्णिवंशियों में वासुदेव (कृष्ण) हूँ, पाण्डवों में धनंजय (अर्जुन) हूँ। मुनियों में व्यास हूँ और कवियों में शुक्राचार्य हूँ।

श्लोक : ३८

मैं दमन करने वालों में दंड हूँ, जीतने वालों में नीति हूँ। मैं रहस्यों में मौन हूँ और ज्ञानियों में ज्ञान हूँ।

श्लोक : ३९

“हे अर्जुन! सभी प्राणियों का जो बीज (मूल कारण) है, वह मैं ही हूँ। इस चर और अचर जगत् में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जो मुझसे रहित हो।”

श्लोक : ४०

हे परंतप! मेरी दिव्य विभूतियों का कोई अंत नहीं है। मैंने तो यह तुझे अपनी विभूतियों का संक्षिप्त वर्णन किया है।

श्लोक : ४१

जो-जो भी ऐश्वर्यशाली, सुंदर और शक्तिशाली वस्तुएँ हैं, उन सबको तू मेरे तेज के अंश से उत्पन्न हुआ जान।

श्लोक : ४२

हे अर्जुन! इस बहुत कुछ जानने से तेरा क्या लाभ? मैं इस संपूर्ण जगत् को अपने एक अंश मात्र से धारण करके स्थित हूँ।

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